गुरुवार, 25 अगस्त 2011

To LoVe 2015: Anna, Lokpal Bill -मत चूको चौहान

अनशन की आंच आखिर सरकार पर दिखने लगी है..सरकार में उछलकूद शुरू हो चुकी है..। फिर भी इतना जान लीजिए राजनीती आसानी से हथियार नहीं डालेगी। बातों को उलझाने में नेता काफी माहिर होते हैं। इसलिए सियासत जनलोकपाल बिल में पेंच लगाने की जुगत में है। वैसे इस आंदोलन के इतने रंग है कि पूछिए मत..एक तरफ धर्म के स्वयंशभू ठेकेदार गुलाटी मार रहे हैं...राष्ट्रधर्म निभाने वाले लोगो को उनकी जाति और धर्म याद दिला रहे हैं..। वहीं नेता लोग सरकारी बाबूओं को अंग्रेजों के जमाने में मिली संऱक्षण को जारी रखने की कोशिश में हैं..। पर पता है कि सबसे अच्छी और खास बात क्या है? वो  यह है कि पिछली पीढ़ी को भूल चुकी आज की नौजवान पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के दादाजी में ही अपने भविष्य को देख रही है। यानि आज के नेताओं की नकेल कसने के लिए ठेठ भारतीय दादाजी ही सक्षम लग रहे हैं इस नौजवान पीढ़ी को।

ग्राउंड जीरो का सच....
इस जनसैलाब में राजनीति चमकाने के लिए ताल ठोककर धर्म और जाति के ठेकेदार भी कूद पड़े हैं....मगर वंदे मातरम् बोलने में रामलीला ग्राउंड में आए रशीद, मुजफ्फर, शबनम, को कोई दिक्कत नहीं है...अन्ना के साये तले इन में से हर कोई मुझे पूरा भारतीय नज़र आया। कोई पंडित, क्षत्रिय, वैश्य या दलित नज़र नहीं आया.। पर बुखारी जी को कौन समझाए...उदित राज को कौन समझाए....। ये सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार से कोई हिंदू मुस्लिम या सिख ईसाई या कोई विशेष जाति वाला नहीं...बल्कि एक भारतीय दुखी है। रामलीला ग्राउंड में आया मुस्लिम या दलित देशभक्ति के नारे ठीक उसी तरह लगाता है जितना कोई हिंदू, सिख या ईसाई लगाता है। उसका स्वाभिमान भारत है न कि धर्म या जाति। पर ये मानेंगे नहीं।


चोर-चोर मौसेरे भाई..?
अनशन ने नेताओं को हिला दिया है। इसलिए नेता लोगों की भावना को समझते हुए कुछ हद तक झुक रहे हैं...लेकिन लगता है कि अफसरों की जमात की अकड़ आड़े आ रही है। वे भूल रहे हैं कि ये जनता के सेवक हैं शासक नहीं....।  इन हालत में टीम अन्ना पर दायित्व ज्यादा बढ़ जाता है कि वो पूरी मांगों के माने जाने तक डटे रहें...।

मत चूको चौहान....
जिन तीन बातों को लेकर संसद में चर्चा की बात सरकार ने कही है, उससे लगता है कि उसकी मंशा सरकारी बाबूओं को लोकपाल के दायरे में लाने और सिटिजन चार्टर की मांग को अटकाना है। जाहिर है कि आम जनता का साबका सबसे पहले निचले स्तर के सरकारी बाबूओं से ही पड़ता है। सिटीजन चार्टर ये तय करेगा की सरकारी बाबू ने समयसीमा में काम नहीं किया, तो उसे आर्थिक दंड भुगतना पड़ेगा...पर सरकार आर्थिक दंड की मांग को नहीं मानना चाहती। सभी राज्यों में लोकायुक्त नियुक्त करने की तीसरी मांग पर भी सरकार की आपत्ति बेकार है। संविधान में साफ लिखा है कि केंद्र के बने कानून राज्यों के कानून से उपर हैं। वैसे भी ये मसला जनता को भ्रष्टाचार से बचाने के लिए है...ऐसे में ये मसला राज्यों के अधिकार में दखल देना कैसे हुआ, ये समझ से परे है। देखिए आज संसद में क्या होता है...। अगर टीम अन्ना इन तीन मुद्दों से पीछे हटी तो सही मायने में ये उसकी हार होगी..। पर टीम अन्ना इन मांगो से समझौता नहीं करेगी। मुझे विश्वास है।

टीम अन्ना को चंदरबरदाई द्वारा पृथ्वीराज चौहान को दिया इशारा याद रखना होगा...
चार हाथ चौबिस गज़, अंगूल अष्ट प्रमाण
तख्त पर सुल्तान है, मत चूको चौहान।।।
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MoViEs To mOvIeS
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