शनिवार, 26 जनवरी 2013

To LoVe 2015: Happy Republic Day..और नंदी साहब प्लीज घर बैठो

आज देश का गणतंत्र 63 साल का हो गया है। एक तरफ राजपथ पर सरहदों की रक्षा करने वाले रणबांकुरे कदमताल कर रहे थे,  तो दूसरी तरफ जयपुर में आशीष नंदी बता रहे थे कि उनके जैसे लोग बदलते समय के साथ बदलने को तैयार नहीं है। एक तरफ राजपथ पर जल-थल-नभ के रखवाले देश वासियों के दिलों में भरोसा और रोमांच भर रहे थे, तो दूसरी तरफ आशीष नंदी जैसे सामाजशास्त्री ये बता रहे थे कि देश में भ्रष्टाचार भी जात-पात में बंटा है। हैरानी होती है ऐसे लोगो को देखकर कि अब भी ऐसे समाजशास्त्री होते हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें नहीं पता था कि वो क्या कह रहे हैं। अब कह रहे हैं मीडिया ने उनका बयान तोड़मरोड़ कर पेश किया। हर बार मीडिया ही दोषी होता है तोड़मरोड़ कर बयान पेश करने का। हद है..इतनी सफाई से तो झूठ न बोलें। अगर आपकी बात का मतलब गलत निकाला जा रहा था तो वहीं साफ-साफ करते।
      इस देश में एक तरफ  एक तरफ औवेसी जैसे नेता है जो धर्म के नाम पर जहर उगलते हैं। तो दूसरी तरफ आषीष नंदी जैसे समाजशास्त्री हैं जो जातिवाद का जहर उगलने से बाज नहीं आ रहे। ऐसे लोगो के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। कम से कम समाजशास्त्रियों को इतना तो समझना चाहिए कि बिना किसी आंकड़े के तो इस तरह की लफ्फाजी न करें। आखिर इससे बेवजह एक साहित्य सम्मेलन बदनाम हो जाता है।
   21वीं सदी में भी 20वीं सदी का राग अलापा जा रहा है। हकीकत में अब समय आ गया है कि पुराने समय के ऐसे समाजशास्त्रियों और नेताओं को हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक कह दिया जाए कि बराये-मेहरबानी अब आप घर पर ही बैंठे। आज जब जात-पात और धर्म से निकल कर युवा वर्ग कहीं आगे जा रहा है....जब जाबांज अपने सिर की बाजी लगाकर सरहदों की रक्षा कर रहे हैं और पूरा देश उनकी जयजकार कर रहा है। उस समय औवेसी औऱ आशीष नंदी जैसे लोगों की  जहरबुझी आवाजें हमारी विविधता में एकता की पहचान पर कुठारघात ही करती हैं। ऐसे बड़़े लोगो की जिम्मेदारी ज्यादा होती है जो समाज के परिवर्तन पर नजर रखते हैं उसका अध्यन करते हैं। उन्हें संभलकर बोलना चाहिए। अगर इतना न हो सके तो बेहतर है कि रिटायरमेंट लें औऱ जीवन संध्या को अपने हिसाब से जिएं।
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