रविवार, 10 फ़रवरी 2013

To LoVe 2015: गद्दारों के लिए इतनी हायतौबा क्यों?


 एक गद्दार का फांसी पर चढ़ना लाजिमी था। कसाब से भी पहले अफजल गुरु का फैसला होना जरुरी थी। हालांकि मैं फांसी की सजा के खिलाफ हूं पर सिर्फ बाकी अपराधों में। देश से गद्दारी की सजा सिर्फ औऱ सिर्फ मौत होनी चाहिए.... इससे कम कुछ नहीं। देश में अब तक फांसी की सजा पाए कई लोगो की दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित है। जिनमें गद्दारों की की तादाद कम नहीं है। इनमें सबसे हैरतंगेज है अबतक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की गरदन का फांसी के फंदे से बचे रहना। देश में इक्सवीं सदी में जाने और कंप्यूटर की दुनिया में प्रवेश करने का विश्वास अगर किसी ने भरा था तो इसका श्रेय सिर्फ औऱ सिर्फ स्वर्गीय राजीव गांधी को है। इक्कसवीं सदी के दूसरे दशक का बीस फीसदी हिस्सा खत्म हो चुका है। अब तो कम से कम इन हत्यारों को बिना देर किए फांसी के फंदे पर लटका दिया जाना चाहिए। आखिर हमें किस बात का इंतजार है। देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या देश की आन पर हमले से कम नहीं थी। 
    
   वैसे भी उच्च्चतम न्यायालय से फैसला हो जाने के बाद एक समय सीमा के अंदर सजा पर अमल हो जाना चाहिए। ख़ासकर आतंकवादियों औऱ गद्दारों के मामलों को जल्द से जल्द निपटा दिया जाना चाहिए।ये इसलिए भी जरुरी है ताकि आतंकवादियों औऱ गद्दारों के दिलों में खौफ पैदा हो। इससे आतंकवादियों और गद्दारों को साफ संदेश दिया जा सकेगा कि वो किसी मुगालते में न रहें....जैसा की अफलज गुरु को था। अखबारों में छपी खबर के अनुसार अफजल ने तिहाड़ में एक पत्रकार को दिए  इंटरव्यू में कहा था कि यूपीए सरकार उसकी फांसी पर फैसला नहीं लेगी। ऐसे गद्दारों औऱ आतंकवादियों की गलतफहमी दूर करने का यही एकमात्र उपाय है कि उन्हें तय समय सीमा में फांसी के फंदे पर लटका दिया जाए। जब तक आतंकवादियों औऱ गद्दारों को सजा नहीं होती तब तक पीड़ितों औऱ उनके परिजनों को भी शांति नहीं मिलती। न ही जान पर खेलकर देश की रक्षा करने वाले वीरों को चैन पड़ता है....न ही जनता सुरक्षित औऱ शांति महसूस करती है।

     हमारा देश दो तरफ से ऐसे देश से घिरा है जो अराजक हैं। एक पाकिस्तान हैं जिसे "आतंकिस्तान" ही कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। दूसरा है बांग्लादेश...जहां से करोड़ों लोग अवैध रुप से भारत में रह रहे हैं। इन अवैध प्रवासियों में लूटेरे, हत्यारे से लेकर आतंकवादी भी शामिल हैं। वहीं देश के अंदर गद्दारों की फौज पनप रही है। देश के रहनुमाओं यानि हर दल को इस मसले पर एकजुट होकर सोचना चाहिए। उन्हें मिलजुल कर गद्दारों औऱ आतंकवादियों को एक तयसीमा में मौत के फंदे तक पहुंचाने का नियम बनाना चाहिए। इस मसले पर सत्ता औऱ विपक्ष को एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी भी नही करनी चाहिए। 

    मीडिया में भी एक तबका आतंकवादियों और गद्दारों के मानवाधिकार की बात कर रहा है। शायद ऐसे लोग मानवाधिकार की बात करते हुए जान पर खेलने वाले औऱ शहीद हुए सुरक्षाकर्मियों के अधिकारों के बारे में नहीं सोचते। न ही आंतकावदी घटना में मारे गए लोगो के मानवाधिकार इन लोगो को याद आते हैं। या तो वो जानबूझकर इस ओर से आंखें मूंद लेते हैं। वहीं कुछ लोगो के बयान आए हैं कि गद्दार अफजल को सही तरीके से बचाव का मौका नहीं मिला। अगर ऐसा नहीं था तो गिलानी कैसे छूट गया? बाकी दोषियों की फांसी की सजा उम्रकैद और दस साल मे कैसे तब्दील हो गई? अगर उसकी पैरवी गलत हुई थी तो बाकी कैदियों की पैरवी सही कैसे हो गई।
     
   बेहतर है कि ये सोच कर हमें खुश होना चाहिए कि चलो आखिरकार एक गद्दार अपने अंज़ाम तक तो पहुंचा। देर से ही उसे उसके किए की सज़ा मिल ही गई। मगर इस मौके पर भी कई लोग बेसुरा राग अलाप रहे हैं। जबकि एक गद्दार सिर्फ गद्दार होता है...मासूमों के खून से खेलने वाला आतंकवादी होता है....ऐसे लोगो का कोई मानवाधिकार नहीं होता। जिन्हें दूसरे के जीने के अधिकार की परवाह नहीं..जिनमें देश से गद्दारी करने की हिम्मत हो...उन लोगो के साथ किसी तरह की नरमी नहीं बरती जाए। सजा निर्धारित होने के कुछ समय में ही उनकी सजा पर अमल हो जाना चाहिए। हम उम्मीद करते हैं स्वर्गीय राजीव गांधी के हत्यारे भी जल्दी ही फांसी के तख्ते पर झूल रहे होंगे। आमीन।
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