शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

To LoVe 2015: ये तेरा वैलेंटाइन..ये मेरा बसंत...

एक चित्र देखा और चंद लाइनें अपने आप निकल पड़ीं...फिर एक दोस्त का इसरार हुआ..और वो चंद लाइनें कच्ची-पक्की सड़कों की तरह कुछ दूर तक निकल पड़ी... वो कच्ची-पक्की पंक्तियां यहां अवतरित हुईं....मगर तबियत नासाज़ होने के कारण पूरे 24 घंटे की देरी से.....
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वहां तेरे शहर में बर्फ की चादर है
यहां मेरे शहर में बारिश की रिमझिम है
वहां बर्फ की चादर पर खेलती 
मुस्कुराती
बर्फ के फाहों को पकड़ती तुम हो
यहां बारिश की बूंदों को पकड़ता
उसकी बोछारों में भीगता मैं हूं
तेरे शहर में अगर बर्फीली शांती पसरी है 
तो मेरे शहर में बरसती बूंदों का शोर है

वहां तेरे शहर से चला वैलेंटाइन
दुनिया में प्यार का राग गुनगुनाता है
तो मेरे शहर में बसंत डेरा डालता है 
वहां तू प्यार की उष्णता से धकेलेगी सर्द हवा
यहां गुनगुनी धूप ज़ज्बातों को सहलाएगी

वहां ग़र बर्फ के तूफ़ान का आग़ाज है
तो यहां मंद-मंद बह रही बसंती बयार है
तेरे यहां से चलकर वैलेंटाइन
गुलाब में छुप और सुर्ख होता है
यहां हर फूल के यौवन में बसंत होता है
वहां से चला  वैंलेंटाइन अगर
आंखों में हया बन इतराता है
तो बसंत यहां दिलों में सुकुन बन इठलाता है 
 '

मेरे दोस्त
तेरे शहर में बिछी बर्फ की चादर
और मेरे शहर में टिप-टिप करती बूंदे
जैसे पानी के ही दो रंग हैं
बसंत-वैलेंटाइन भी बस वैसे ही
अनंत-अविनाशी प्यार के ही दो रुप हैं
जो शहर-दर-शहर...बस्ती-दर-बस्ती 
महीने-दर-महीने..साल-दर-साल
बिना किसी सरहद को माने
यायावर बना चक्कर काटता है 

मेरे दोस्त
ये औऱ कुछ नहीं....
बस ढाई आखर का प्रेम है
जो न उंच-नींच देखता है
न अमीर-गरीब देखता है
बस मुठ्ठीभर का दिल देखता है
और बस यूं ही
अपनी अलख जगाता है....
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FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

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