गुरुवार, 2 मई 2013

To LoVe 2015: हम..हमारी राजनीति...औऱ चाणक्य-2

अक्सर हमें लिखना कुछ होता है..हम लिखने कुछ लग जाते हैं। ये आम बात है। जाहिर है विचारों के प्रवाह का क्या भरोसा...या कहिए बातों के घोड़े अचानक बेलगाम हो जाएं तो क्या कर सकते हैं। समाज में इस समय इतनी तेजी से घटनाएं घट रही हैं कि हम सब अचंभे में हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए ऐस-ऐसे विचार सामने आ रहे हैं कि पूछिए मत। बड़े-बड़े पद पर बैठे लोग तक ऐसे अजीबो-गरीब नियम बनाने की बात करते हैं कि पूछिए मत। हम भी  इस घालमेल का शिकार हैं। इसलिए बेहतर है कि हम अलग-अलग मुद्दों पर एक साथ बात करने की जगह  बारी-बारी चीजों पर नडर डालें। वैसे सारे मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हैं। पर बारी-बारी ही चीजों को समझना होगा। वरना हम भी ऐसे हो जाएंगे जैसे धतुरा खाया हुआ कोई इंसान। हालांकि आज के हालात में हमारे समाज में लगता है कि लोगो के विचार धतुरा खाकर ही पैदा हो रहे हैं। खैर पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों के बाद देश के अंदर की राजनीतिक स्थिती देखें। इसके बाद ही हमारी समझ में आएगा कि हमारे कानून बनाने वाले नेताओं के पास फुर्सत कहां है औऱ जनता अपने में कैसे उलझी हुई है। जिस कारण समाजिक मुद्दों पर भी गंभीर विचार नहीं आ पा रहे। 
फसाएंगे पार्टी नेता??
    अभी देश की जो राजनीति स्थिती है...उसे देख कर अच्छे-भले आदमी को चक्कर आ जाए...। जिधर नजर उठाओ उधर घोटालो का राज है। सभी इस हमाम में डूबे नजर आते हैं। चंद ही नेता हैं जो इससे बचे हुए हैं..पर जो बचे हुए हैं...उन्हें उनके चारों ओर जमा लोग डूबाने पर तुले हुए हैं। अब ममता बनर्जी को ही लीजिए। व्यक्तिगत तौर पर ममता बनर्जी की छवि उज्जवल है। पालिटिक्ल करेक्ट होना उन्हें आता नहीं है...इसलिए कई बार उल्टे-पुल्टे बयान देकर वो फंस जाती हैं। अब चिटफंड घोटाले में उनकी पार्टी के नेताओं के नाम आने से उनके लिए मुसीबत खड़ी हो गई है।     

 पंजाब हो या उड़िसा...असम हो या महाराष्ट्र....कश्मीर हो या केरल...हर राज्य का यही हाल है। हर जगह घोटालो की भरमार है। नेता से लेकर प्रशासन तक उमसें फंसा है। पूरा तंत्र बिखरा-बिखरा दिखता है। जनता प्रशासन से त्रस्त है। नेता अपने लोगो से त्रस्त है। प्रशासन अपने खुद के मकड़जाल और उपर बैठे नेताओं से त्रस्त है। हालात ये हैं कि मामूली काम के लिए भी अदालती चाबूक की जरुरत पड़ रही है। लगता है जैसे प्रशासन पंगु हो चुका है।
    नेता राजकाज करना भूल चुके हैं..या उन्हें राजकाज करना आता नहीं है। जो नेता निष्पक्ष काम करते हैं उन्हें हमेशा ये डर सताता रहता है कि वो अगला चुनाव जीतेंगे या नहीं। वैसे जो लगातार जीत रहे हैं उनके क्षेत्र में भी आमूलचूल परिवर्तन नहीं हुआ है। ईमानदार नेता के पीछे कार्यकर्ताओं या जनता की फौज नहीं है। राष्ट्रीय स्तर का नेता भी स्थानीय मुद्दों के में फंसा रहता है। 
अय्यर-साफ छवि के बाद भी हारे
     हम भी बड़े आराम से कह देते हैं कि सभी चोर संसद में बैठते हैं....लेकिन उनको चुनकर हम भेजते हैं। अबतक कई ईमानदार नेताओं को जनता बूरी तरह हरा चुकी है। कई नेता भीतरघात से तो कई नेताओं को वोटरों की उदासिनता ले डूबी है। क्षेत्रीय पार्टियों की सोच राज्य में सत्ता में काबिज रहने से आगे नहीं बढ़ती। उनके घातक बयानों से जनता भी खुश रहती है। सारे देश में लोगों के विचारों में एकरुपता नहीं है। हालात ये हैं कि बड़े शहरों में किसी एक घटना को लेकर क्षेत्र विशेष के लोगो पर छींटाकशी शुरु हो जाती है।
 कहावत है कि आवश्यकता अविष्कार की जननी है। यही समाज पर लागू होता है। नेता कहीं से टपकता नहीं है। गांधी भी तब पैदा हुए थे जब कांग्रेस के झंडे तले देश भर के राष्ट्रीय सोच वाले तमाम नेता एकजुट हो चुके थे। कांग्रेस भी तब पैदा हुई जब अंग्रेजों को जनता औऱ सरकार के बीच संपर्क का अभाव महसूस हुआ। नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी उस समय सुप्रीम कमांडर बने जब जापान की कैद में मौजूद भारतीय सिपाही सरदार मोहन सिंह की कमान में पहुंच चुके थे। 

इसलिए जबतक राष्ट्रीय सोच के लोग को तमाम विरोधाभाष के बावजूद एकजुट नहीं होंगे..तबतक हमें कोई राजनेता नहीं दिखेगा....न ही कोई राजनेता राष्ट्रनेता बनने की सोचेगा।         (क्रमश:)
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