मंगलवार, 11 जून 2013

To LoVe 2015: आड़वाणी की नहीं मानीं, आड़वाणी मान गए !

ज की सबसे बड़ी खबर ! भारतीय जनता पार्टी के तमाम अहम पदों से इस्तीफा देने वाले वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की कोई बात नहीं मानी गई, लेकिन वो मान गए। देश को हैरानी इस बात पर हुई कि जब आडवाणी ने इस्तीफा दिया, उस समय वो देश के सामने नहीं आए और जब आज वो मान गए,  फिर भी जनता के सामने नहीं आए। पार्टी और पार्टी के नेताओं पर तमाम गंभीर आरोप लगाने वाले आडवाणी के साथ क्या " डील " हुई ? पार्टी की ओर से इसकी अधिकारिक जानकारी भले ही ना दी गई हो, लेकिन सियासी गलियारे की चर्चा के मुताबिक आडवाणी चाहते हैं कि अगर आम चुनाव में एनडीए को बहुमत मिलता है तो छह महीने के लिए ही सही लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जाए। चूंकि आडवाणी खुद संघ के स्वयं सेवक हैं, इसलिए उन्हें पता है कि संघ के साथ मिलकर पार्टी में जो फैसला एक बार हो जाता है, उसे वापस नहीं जा सकता। यही वजह है कि उन्होंने नरेन्द्र मोदी को प्रचार समिति के अध्यक्ष पद से वापस करने की कोई मांग नहीं रखी। हां पार्टी और संघ के सख्त रुख को भांपकर आडवाणी को ये डर जरूर सता रहा था कि कहीं वो राजनीति गुमनामी में ना खो जाएं, इसलिए उन्होंने 24 घंटे के भीतर ही समर्पण करना बेहतर समझा। अब पार्टी में एक तपके का मानना है कि कोई भी नेता कितना ही बड़ा क्यों ना हो, अगर वो अनुशासनहीनता करता है तो क्या उसे पार्टी से बाहर का रास्ता नहीं दिखाना चाहिए ? आडवाणी ने अपने इस्तीफे का पत्र सार्वजनिक किया, उससे क्या पार्टी की प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आई है, ऐसे में क्यों ना आडवाणी प्रकरण को पार्टी की अनुशासन समिति को सौंप दिया जाए ?

कहा जा रहा है कि आडवाणी ने  अपने इस्तीफे की एक दिन पहले ही पूरी रूपरेखा तैयार कर ली थी और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को इस बारे में बता भी दिया था। चर्चा है कि उन्होंने इस्तीफा न देने के लिए पार्टी के सामने अपनी शर्ते भी रखीं थीं। उनकी पहली शर्त यही बताई जा रही है कि आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए उन्हें पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाए। आडवाणी को मालूम है कि अब उनकी पार्टी में पहले जैसी बात नहीं रही है, इसलिए उन्होंने अपना रुख थोड़ा नरम रखा और कहाकि अगर एनडीए सत्ता में आती है तो उन्हें कम से कम छह महीने के लिए प्रधानमंत्री बनने का मौका दिया जाए। सूत्र बताते हैं कि आडवाणी ने साफ किया था कि वो कई दशक से पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता रहे है, इसलिए पीएम के पद पर पहला हक उन्हीं का बनता है। वो यहां तक तैयार रहे कि अगर पार्टी किसी दूसरे नेता को आगे करना चाहती है तो वो छह महीने बाद खुद ही प्रधानमंत्री पद उसके लिए खाली कर देंगे। बता रहे हैं कि आडवाणी इतना झुकने को तैयार रहे, लेकिन पार्टी और संघ ने उनकी शर्तों को बिल्कुल भी भाव नहीं दिया। इसके बाद उनके सामने इस्तीफा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। हालांकि आडवाणी भी अच्छी तरह जानते हैं कि अब उनकी जगह पार्टी में नहीं बस पोस्टर में रह गई है। 

हां एक बात और । ये सही है कि आडवाणी नरेन्द्र मोदी को प्रचार समिति  का अध्यक्ष बनाए जाने के बिल्कुल खिलाफ थे। गोवा कार्यकारिणी की बैठक के ऐन वक्त पर उन्होंने मोदी के मामले में अपनी बात रखी और कहाकि मोदी को प्रचार समिति का अध्यक्ष ना बनाकर संयोजक  बनाया जाए। बताया जा रहा है कि जब उन्हें बताया गया कि गोवा में नरेन्द्र मोदी को एक निर्णायक भूमिका सौंपी ही जाएगी, इस पर  अंतिम फैसला हो चुका है, तब आडवाणी ने अपनी बीमारी का आखिरी इलाज बताया कि अगर किसी वजह से मोदी को अध्यक्ष बनाया भी जाता  है तो उन्हें स्पष्ट निर्देश दिए जाएं कि वो हर छोटे बड़े फैसले मेरी सहमति से लेगें। सरकारी शब्दों में कहें तो इसका मतलब मोदी को आडवाणी के मातहत रहना होगा और उन्हें ही रिपोर्ट करना होगा। आडवाणी की इस शर्त के पीछे मंशा ये थी कि इससे जनता में संदेश जाएगा कि चुनावी  रणनीति के असली सूत्रधार आडवाणी ही है। बताया जा रहा है कि ये जानकारी जब संघ को दी गई तो वहां से साफ किया गया कि वो गोवा में अपना फैसला करें, दिल्ली से बात बंद कर दें। इशारा साफ था कि आडवाणी गोवा आएं या ना आएं जो फैसला हो चुका है, उसका ऐलान किया जाए। मतलब नरेन्द्र मोदी को प्रचार की कमान पूरी तरह से सौंप दी जाए। संघ का सख्त रुख देखकर फिर पार्टी नेताओं ने आडवाणी से बातचीत बंद कर दी और मोदी के नाम का ऐलान कर दिया गया।

जरूरी बात ! आडवाणी ने इस्तीफे में आरोप लगाया है कि अब पार्टी के नेता ना देश के लिए काम कर रहे हैं और ना ही पार्टी के हित में बल्कि वो निजी स्वार्थ की राजनीति कर रहे हैं। आडवाणी जी ये आरोप तो आप पर भी लागू होता है। आपके  इस्तीफे पर ध्यान दें तो उसके मुताबिक तो आप महज पार्टी के सांगठनिक पदों से त्यागपत्र दे रहे हैं,  लेकिन पार्टी की प्राथमिक सदस्यता अपने पास रखी है। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के जिन सिद्धांतों की बात आप कर रहे हैं, अगर बीजेपी वाकई उन पर नहीं चल रही हैं तो आपने ऐसी सिद्धांतविहिन पार्टी की प्राथमिक सदस्यता क्यों नहीं छोड़ी ? क्या ये सच नहीं है कि पार्टी की सदस्यता अपने पास बरकरार रखने के पीछे भी आपकी भविष्य की राजनीति छिपी है। आप आज भी एनडीए के चेयरमैन हैं,  और ये पद आपके पास तभी तक रह सकता है, जब तक आप बीजेपी के सदस्य हैं। क्योकि बीजेपी एनडीए में सबसे बड़ा घटक दल है, लिहाजा एनडीए का चेयरमैन बीजेपी का ही चुना जाना है। आडवाणी जी क्यों इतनी लंबी - लंबी छोड़ रहे थे। अच्छा सबको पता है कि एक  जमाने मे आप ही मोदी के सबसे बड़े शुभचिंतक थे। हालाकि गोधरा के लिए मैं भी काफी हद तक ये मानता हूं कि मोदी प्रशासन वहां फेल रहा है , लेकिन गोधरा के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तो उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटाना चाहते थे, तब आपने ही उन्हें बनाए रखने की वकालत की थी। उसका कर्ज भी मोदी ने उतारा और आपको गुजरात से लोकसभा चुनाव लड़ाकर दिल्ली भेजा। आज जब मोदी कद बढ़ा तो आपको इतनी तकलीफ हुई।

वैसे अनुशासनहीनता और पार्टी को विवादों में खड़ा करने का सवाल हो तो आडवाणी भी पीछे नहीं रहे हैं। 2005 में पाकिस्तान की यात्रा के दौरान मुहम्मद अली जिन्ना को 'सेकुलर' कहे जाने के कारण उन्हें पार्टी और संघ के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं उन्हें भाजपा अध्यक्ष का पद भी छोड़ना पड़ा। दो दिन पहले जिस नीतिन गड़करी में आपका इतना विश्वास दिखाई दिया, 26 मई, 2012 को इन्हीं नितिन गडकरी को दोबारा पार्टी अध्यक्ष बनाने की बात चली तो ये नाराज हो गए और मुंबई में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद रैली में हिस्सा नहीं लिया। तीन सितंबर, 2012 को आपने अपने ब्लाग में लिखा कि इस बात की पूरी संभावना है कि अगला प्रधानमंत्री गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई होगा। क्या इससे पार्टी की छवि पर असर नहीं पड़ा। नौ मार्च, 2013 पार्टी की कार्यकारिणी में भाषण देते हुए आडवाणी ने कहा पिछले कुछ वर्षो में मुझे यह महसूस करके निराशा हुई है कि जनता का मूड सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ है, लेकिन वह भाजपा से भी बहुत उत्साहित नहीं है। मतलब क्या समझा जाए। इतना ही नहीं 12 मई, 2013 कर्नाटक में हार के बाद अपने ब्लाग में आडवाणी ने लिखा कि अगर भाजपा जीतती तो आश्चर्य होता ! ताजा मामला अब जबकि लोकसभा का चुनाव करीब है, पार्टी को मजबूत दिखाना चाहिए, तब वो गोवा कार्यकारिणी की बैठक में नाराज होकर नहीं गए।

मैं बीजेपी की तमाम नीतियों और उसकी विचारधाराओं से सहमत ना होने के बाद भी ये जरूर कहना चाहता हूं कि आज केंद्र की सरकार खासतौर पर कांग्रेस से जनता बुरी तरह त्रस्त है। वो  एक बदलाव चाहती है। आज देश की जरूरत महज सत्ता परिवर्तन की नहीं है, देश अपना चरित्र बदलने को तैयार बैठा है। मुझे नहीं लगता कि अब देश की जनता केंद्र में कमजोर सरकार  बर्दास्त करने का जोखिम लेने को तैयार है।  जनता भी नई सोच के साथ आगे बढ़ना चाहती है। ये कहना कि मोदी को नेता बनाया गया तो एनडीए छिटक जाएगा। इस मामले में सबसे ज्यादा बातें जेडीयू और शिवसेना को लेकर हो रही है। ईमानदारी की बात तो ये है कि आज बिहार में जेडीयू का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है। लोकसभा के उपचुनाव में करारी हार ने जेडीयू की बिहार में राजनैतिक हैसियत बता दी है। रही बात शिवसेना की तो वहां पार्टी को लगता है कि शिवसेना के बजाए अगर वो मनसे यानि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ( राज ठाकरे) से गठबंधन करती है तो ज्यादा फायदे में रहेगी। ऐसे में एनडीए को भी सच्चाई से मुंह छिपाने की जरूरत नहीं है। सच तो ये है कि आज आडवाणी ने आगामी लोकसभा के चुनाव का मुद्दा ही बदल दिया है। बहरहाल आडवाणी के इस्तीफे के बाद हुए घटनाक्रम से जेडीयू को भी समझ लेना चाहिए कि बीजेपी मोदी को ही आगे रखकर चुनाव के  मैदान में उतरेगी। अगर उसे मंजूर है तो एनडीए में रहे, वरना उसे अभी रास्ता तलाशना चाहिए। लेकिन सब जानते हैं कि नीतिश कुमार कुर्सी छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकते, लिहाजा वो यूं ही गीदड़ भभकी देते रहेंगे।

आखिर में आडवाणी जी से दो बातें दो टूक कहना चाहता हूं। आडवाणी जी आपने उस दिन इस्तीफा क्यों नहीं दिया जब आपके ना चाहते हुए भी नेता विपक्ष का पद छीना गया ? अपने घर से कितनी बार आप संघ मुख्यालय भी तलब किए गए। मेरा तो मानना  है कि आपके साथ अन्याय तो उस दिन हुआ था। इसके बाद तो पार्टी ने आप पर भरोसा किया और आप पीएम इन वेटिंग रहें। आपकी अगुवाई में चुनाव लड़ा गया, आप मनमोहन सिंह से मुकाबला नहीं कर पाए। आज तो आप नौजवानों के नब्ज को पहचानिए। देखिए आप ने मोदी को प्रचार समिति के अध्यक्ष बनने में रुकावट डालने की कोशिश की, देश का नौजवान आपके घर के सामने जमा होकर प्रदर्शन करने लगा। आप इसी तरह अपनी जिद्द पर अड़े रहते तो शायद आज के बाद आप देश के किसी भी हिस्से में जाते आपको ऐसे ही विरोध का सामना करना पड़ता। आपने ये भी देखा कि आपके इस्तीफे की खबर को मीडिया ने हाथोहाथ लिया, लेकिन आपके समर्थन में देश के किसी भी हिस्से मे दो आदमी सड़क पर नहीं निकले। यहां तक की आपके निर्वाचन क्षेत्र गांधीनगर में भी नहीं। क्या ये आपके लिए काफी नहीं है कि आप देश की मंशा को समझें ? मेरा तो मानना है कि आज मोदी ने जो जगह बना ली है, उनका विरोध करके आप कहीं से भी चुनाव नहीं जीत सकते हैं। आपको चुनाव सुषमा स्वराज, वैकैया नायडू, मुरली मनोहर जोशी, अनंत कुमार या फिर एनडीए संयोजक शरद यादव कत्तई नहीं जिता सकते। बहरहाल आपने 24 घंटे के भीतर ही पार्टी की बात मानी, मुझे लगता है कि इस्तीफा  देकर आपने अपने जीवन की जो सबसे बड़ी राजनीतिक भूल की थी, उसे उतनी जल्दी ही सुधार कर अच्छा किया। अब  आप मीडिया के सामने आएं और ऐसा संदेश दें, जिससे लगे कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है।



नोट: -   मित्रों ! मेरा दूसरा ब्लाग TV स्टेशन है। यहां मैं न्यूज चैनलों और मनोरंजक चैनलों की बात करता हूं। मेरी कोशिश होती है कि आपको पर्दे के पीछे की भी हकीकत पता चलती रहे। मुझे " TV स्टेशन " ब्लाग पर भी आपका स्नेह और आशीर्वाद चाहिए।
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