रविवार, 16 जून 2013

To LoVe 2015: रिमझिम गिरे सावन...उलझ-सुलझ जाए मन


पिछले महीने ही शिमला जाने का प्रोग्राम बनाया हुआ था...मगर सबकुछ धरा का धरा रह गया..उत्तर की जगह पूरब की दिशा में दूसरे शहर जाना पड़ गया...फिर खड़े पैर उस शहर में काम पूरा करके लौटा तो देखा की प्रकृति ने शिमला न जाने की कसक दूर करने का इंतजाम कर दिया था..कहां तो दिल्ली के आसमां में सूरज चाचा को चमकता छोड़ गया था...और कहां अब घने बादलों ने आकर दिल्ली और आसपास के इलाकों में डेरा डाला हुआ था....पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ कि ये जेठ के महीने की दिल्ली है...दिल्ली में गर्मी के महीने से जहां आइसक्रीम..कोल्ड ड्रिंक...कुल्फी...शरबत औऱ जूस के सहारे मुकाबला करने का मजा आता था..वो मुकाबला इस बार सावन ने मानो अपना दूत भेजकर रोक दिया है....और मेघरूपी दूत ने गर्मी में ही आकर दिल्ली में झड़ी लगा दी है।
  क्या यही वो मेघदूत हैं जो संदेशा दूर-दूर तक पहुंचाते हैं? जलते मन को शीतलता प्रदान करते हैं...अब गर्मी के थपेड़ों की जगह सावन के दूतों ने जब पुरबइया की बयार बहा ही दी तो मन म्यूर को तो नाचना ही था....मन कहता है कि सब कामधाम छोड़ो औऱ इस भीगती बारिश में जमकर भीगो..हरी-भरी घास पर जमकर पानी में छपा-छप करो...मन के ऐसा सोचते ही वहां छुपा बच्चा अंगड़ाई लेकर भीगने को तैयार हो जाता है..भीगते हुए कानों में बारिश के रिमझिम के साथ माताजी की आवाज भी आती है..पहली बारिश में ज्यादा नहीं नहाओ..पर बच्चा कब मानता है....
    पड़ोस में ही कुछ बच्चे पानी में रेस लगा रहे हैं....उनके साथ ही दिल रेस लगाने को तैयार हो जाता है....धीरे से मन का बच्चा गेट पर पहुंचता है....गेट को खोल बाहर बूदों के बीच हाथ फैला देता है....पानी में छप-छप करते दौड़ते बच्चों को देखकर बच्चा मुस्कुरा देता है....सामने वाला बच्चा भी मुस्कुरा देता है...मगर इससे पहले की अंदर बैठा बच्चा हावी हो....दिल में बच्चे के साथ ही रहता बड़ा आदमी कुलबुलाता है...वो उनींदा सा है....मगर उनींदे ही वो बच्चे को घर से न निकलने को कहता है....बच्चा चुपचाप खिड़की पर बैठ कर बारिश की बूंदो को देखने लगता है....बच्चा चुपचाप होकर बैठा हो तो भी शांत नहीं बैठ पाता....वो बारिश की बूंदों को पकड़ने लगता है....उन बूंदों के अहसास से उनींदा आदमी जगने लगता है....उसे जगता देख बच्चा कहीं दुबक जाता है...ऐसा क्यों होता है? बच्चा तभी क्यों जागता है जब मन शांत होता है? पता नहीं..
   फिर भी बच्चा जब भी मौका मिलता है, अंगड़ाई लेने लगता है...शायदही बच्चा बड़े आदमी का सच्चा साथी होता है...जो शायद  बडे आदमी को पूरी तरह से गिरने से बचाता रहता है...ज्यादा उदास होने से रोकता है...खिलखिला कर हंसने में मदद करता है....हारकर भी हारने नहीं देता..शायद दिल में छुपा यही बच्चा है जो हर बार ऩए सिरे से शुरआत करने की प्रेरणा देता है...शायद यही बच्चा है जो पानी में रेस लगता है..बारिश की रिमझिम में छपाछप करता है..औऱ इंसान को निराशा के गर्त में डूबने नहीं देता.....। ..
 अब मैं बूंदों को पकड़ने की कोशिश करने लगता हूं....बारिश की हल्की फुहार धीरे-धीरे चेहरे को भीगोने लगती है....तभी मेरी नजर ठहर जाती हैं पीपल के पत्तों  पर ठहरी हुई बूंदों पर....उन बुंदों को देखते हुए किसी के चेहरे पर ठहरी हुई बूंदे याद आ जाती हैं....पत्तों पर ठहरी हुई बूंदे चमक रही हैं...कुछ उस झूमके की चमक की तरह जो किसी के कानों में झूलते हुए चमकते रहते थे...ये बारिश की बूंदे भी अजीब हैं..यहां पत्तों पर ठहर कर एक सम्मोहन पैदा कर रही हैं...पत्तों की सुंदरता को बड़ा रही हैं...उस सुंदर मुखड़े पर भी इसी तरह ठहरती थीं मानों ठिठक गई हों...
    इन टिपटिप बूंदों के शोर से एक भूला बिसरा गीत जेहन  में गूंज रहा है....अंदर जेहन में बजते गीत ने लगता है कि रिमझिम बूंदों की टिप-टिप से तालमेल बिठा लिया है...अंदर गूंजते इस गीत के साथ जाने कितने चेहरे बनने-बिगड़ने लगे है...इससे पहले कि ये चेहरे कोई एक रुप धरे बैचेन करें..इन्हें भीगो देना ही ठीक है..अपने अंदर गूंजते संगीत को अपने अंदर ही समेटे मैं अपने को श्वेत-श्याम मेघों के नीचे छोड़ देता हूं..बिना कुछ कहे..बिना कुछ सोचे....। 

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FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
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