रविवार, 28 जुलाई 2013

To LoVe 2015: सम्मान : क्या भूलूं क्या याद करुं ?

मित्रों क्या भूलूं और क्या याद करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। दरअसल इस पोस्ट को लेकर मैं काफी उलझन में था। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूं कि अपनी 200 वीं पोस्ट किस विषय पर लिखूं। वैसे तो आजकल सियासी गतिविधियां काफी तेज हैं, एक बार मन में आया कि क्यों न राजनीति पर ही बात करूं और देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस से पूछूं कि 2014 में आपका प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है ? फिर मुझे लगा कि इन बेचारों के पास आखिर इसका क्या जवाब होगा ? क्यों मैं इन पर समय बर्बाद करूं। बाद में मेरी नजर तथाकथित तीसरे मोर्चे पर गई, ममता, मायावती, मुलायम और नीतीश कुमार, इनमें से क्या कोई गुल खिला सकता है ? पहले तो लगा कि इस पर लिखा जा सकता है, लेकिन फिर सोचा कि मुलायम पर भला कौन भरोसा कर सकता है ? देखिए ना राष्ट्रपति के चुनाव में ममता को आखिरी समय तक गोली देते रहे, बेचारी कैसे बेआबरू होकर दिल्ली छोड़कर कलकत्ता निकल भागी। ऐसे में थर्ड फ्रंट पर तो किसी तरह की बात करना ही बेमानी है। एक बात और की जा सकती है, आजकल तमाम नेता सस्ते भोजन का ढिंढोरा पीट रहे हैं, कोई 12 रुपये में भोजन करा रहा है, कोई 5 रुपये में, एक नेता तो एक ही रुपये में भरपेट भोजन की बात कर रहे हैं। क्या बताऊं, एक रूपये में तो कुत्ते का बिस्कुट भी नहीं आता। अब नेताओं की तरह मैं तो सस्ते भोजन पर कोई बात नहीं कर सकता।

विषय की तलाश अभी भी खत्म नहीं हुई। मैने सोचा कि देश में एक बड़ा तबका खेल को बहुत पसंद करता है। इसलिए खेल पर ही कुछ बातें करूं। लेकिन आज तो देश में खेल का मतलब सिर्फ क्रिकेट है। बाकी खेल तो हाशिए पर हैं। अब क्रिकेट की आड़ में जो आज जो कुछ भी चल रहा है, ये भी किसी से छिपा नहीं है। मैं तो अभी तक क्रिकेट का मतलब सुनील गावस्कर, कपिल देव, सचिन तेंदुलकर समझता था, लेकिन अब पता  लगा कि मैं गलत हूं। आज क्रिकेट का मतलब है बिंदु दारा सिंह, मयप्पन और राज कुंद्रा। आईपीएल के दौरान टीवी चैनलों पर जितनी चर्चा खेल की नहीं हुई, उससे कहीं ज्यादा चर्चा सट्टेबाजी की हो गई। वैसे बात सिर्फ सट्टेबाजी तक रहती तो हम एक बार मान लेते कि इसमें गलत क्या है, कई देशों में तो सट्टेबाजी को मान्यता है। हमारे देश में भी ऐसा कुछ शुरू हो जाना चाहिए। लेकिन यहां तो क्रिकेट की आड़ में हो रहा ऐसा सच सामने आया कि इस खेल से ही बदबू आने लगी। बताइये खिलाड़ियों को लड़की की सप्लाई की जा रही है, चीयर गर्ल को भाई लोगों ने कालगर्ल बना कर रख दिया। खिलाड़ी मैदान के बदले जेल जा रहे हैं। फिर जिस पर क्रिकेट को बचाए रखने की जिम्मेदारी है, उसी श्रीनिवासन की भूमिका पर उंगली उठ रही है। टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी की पत्नी स्टेडियम में उस बिंदु दारा सिंह के साथ मौजूद दिखी, जिस पर गंभीर ही नहीं घटिया किस्म के आरोप लग रहे हैं। अब ऐसे क्रिकेट पर लिख कर मैं तो अपना समय नहीं खराब कर सकता। क्रिकेट आप सब को ही मुबारक !

खेल को खारिज करने के बाद मैने सोचा कि चलो मीडिया पर चर्चा कर लेते हैं। आजकल मीडिया बहुत ज्यादा सुर्खियों में है। हर मामले में अपनी राय जाहिर करती है। फिर कुछ दिन पहले बड़ा भव्य आयोजन भी हुआ है, पत्रकारों को उनके अच्छे काम पर रामनाथ गोयनका अवार्ड से नवाजा गया है। इसलिए मीडिया को लेकर कुछ अच्छी-अच्छी बाते कर ली जाएं। सच बताऊं मुझे तो यहां भी बहुत निराशा हुई। इस अवार्ड में भी ईमानदारी का अभाव दिखाई देने लगा है। मेरा व्यक्तिगत मत है कि ये अवार्ड पत्रकारों को सम्मानित नहीं करता है, बल्कि कुछ बड़े नाम को बेवजह इसमें शामिल कर खुद ये अवार्ड ही सम्मानित होता है। अंदर की बात ये है कि जब बड़े नाम शामिल होते हैं, तभी तो ये खबर टीवी चैनलों पर चलती है। मैं इस बिरादरी से जुड़ा हूं इसलिए ज्यादा टीका टिप्पणी नहीं करूंगा, लेकिन मुझे दो बातें जरूर कहनी है। पहला तो मैं ये जानना चाहता हूं कि किस ईमानदार जर्नलिस्ट की पसंद थे सीबीआई डायरेक्टर रंजीत सिन्हा। ये विवादित हैं, इनकी ईमानदारी संदिग्ध है, इनके कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को "तोता" तक कह दिया। रामनाथ गोयनका अवार्ड एक "तोता" बांटेगा और वो "तोता" सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के बराबर खड़ा है। मैने जब इन्हें मंच पर पत्रकारों को पुरस्कार देते हुए देखा तो सच में मन बहुत खिन्न हुआ। एक बात और जो मुझे ठीक नहीं लगी। मैं एनडीटीवी के रवीश कुमार का प्रशंसक हूं, लेकिन मैं प्रशंसक उनकी रिपोर्टिंग के लिए बल्कि उनके प्राइम टाइम एंकरिंग के लिए हूं। दिल्ली की एक बस्ती खोड़ा की दिक्कतों पर स्टोरी करने के लिए उन्हें ये अवार्ड दिया गया। मुझे लगता है कि एनडीटीवी में ही एक कम उम्र का रिपोर्टर है, उसने दिल्ली की तमाम कालोनियों की मुश्किलों को और बेहतर तरीके से जनता तक पहुंचाया है। अब देखिए मैं तो जर्नलिस्ट हूं, जब मुझे ही इस रिपोर्टर का नाम नहीं मालूम है तो भला रामनाथ गोयनका अवार्ड देने वालों को ये नाम कैसे याद हो सकता है। ये हाल देख मैने मीडिया से भी किनारा कर लिया।

अब सोचा कि बात नहीं बन रही है तो चलो सामयिक विषय पर एक चार लाइन की कविता लिखते हैं, वैसे भी 200 वीं पोस्ट को भला कौन गंभीरता से पढ़ता है। सब पहली लाइन पढ़ कर 200 वीं पोस्ट की बधाई देकर निकल जाते हैं। अच्छा है कि चार छह लाइन की अच्छी सी कविता लिख दी जाए। लेकिन जब भी बात कविता की होती है, मेरे रोंगटे खडे हो जाते हैं। आप सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसा क्या है कि कविता पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। क्यों ना खड़े हों, अब ब्लाग पर कविता ही ऐसी लिखी जा रही है। आलू, बैगन, टमाटर, गाजर, मूली, खीरा, तरबूज, गर्मी, ठंड, बरसात, लू जब कविता का विषय हो तो आसानी से समझा जा सकता है कि कविता कितने निचले पायदान तक पहुंच गई है। कुछ लोगों ने बहुत कोशिश की तो कविता की आड़ में आत्मकथा परोस दी। ब्लाग पर प्यार पर बहुत सारी कविताएं मिलती हैं, लेकिन ज्यादातर कविताओं में प्यार से जुड़े शब्दों की तो भरमार होती है, लेकिन कविता में वो अहसास नहीं होता, जो जरूरी है।

इन्हीं उलझनों के बीच मेरी निगाह काठमांडू गई। मैंने सोचा चलो 200 वीं पोस्ट अपने ब्लागर मित्रों को समर्पित करते हैं और उन्हें बेवजह ठगे जाने से बचने के लिए पहले ही आगाह कर देते हैं। क्योंकि यहां कुछ लोग एक बार फिर बेचारे सीधे-साधे ब्लागरों को सम्मान देने के नाम पर उनका बाजा बजा रहे हैं। हालाकि जैसे ही मैं इनके चेहरे से नकाब उतारूंगा, ये गाली गलौज पर उतारू हो जाएंगे, ये सब मुझे पता है। लेकिन अगर सच जानने के बाद एक भी ब्लागर ठगे जाने से बचता है तो मैं समझूंगा कि मेरी कोशिश कामयाब रही। आपको पता ही है कि एक गिरोह जो अपने सम्मान का कद बढाने के लिए इस बार उसका आयोजन देश से बाहर कर रहा है। अब क्या कहा जाए! इन्हें लगता है कि सम्मान समारोह देश के बाहर हो तो इसका दर्जा अंतर्राष्ट्रीय हो जाता है। हाहाहाहाहाह....। इस सम्मान की कुछ शर्तें है, सम्मान उन्हें मिलेगा जो वहां जाएंगे, वहां वही लोग जा पाएंगे जो पहले अपना पंजीकरण कराएंगे, पंजीकरण वही करा पायेगा जिसके पास 4100 रुपये होगा। सम्मानित होने वालों को कुछ और जरूरी सूचनाएं पहले ही दे दी गई हैं। जिसमें सबसे महत्वपूर्ण ये कि एक कमरे में तीन लोगों को रहना होगा। इसके अलावा आधा दिन उन्हें नान एसी बस से काठमांडू की सैर कराई जाएगी, लेकिन यहां प्रवेश शुल्क सम्मानित होने वालों को खुद देना होगा।

पता नहीं आप जानते है या नहीं भारत का सौ रुपया नेपाल में लगभग 160 रुपये के बराबर होता है। हो सकता है कि पैसे वाले ब्लागर चाहें कि वो आलीशान होटल में रहें, वो क्यों तीन लोगों के साथ रुम शेयर करेंगे। पैसे से कमजोर ब्लागर किफायती होटल में रहना चाहेगा। मेरा एक सवाल है कि जब लोग अपने मनमाफिक साधन से नेपाल तक का सफर कर सकते हैं, तो उनके रुकने का ठेका आयोजक क्यों ले रहे हैं ? अब देखिए कुछ लोग वहां हवाई जहाज से पहुंच रहे होंगे, कुछ बेचारे ट्रेन से गोरखपुर जाकर वहां से बार्डर क्रास कर सकते हैं, उत्तराखंड वाले बनबसा से बस में सफर कर सकते हैं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि ये ब्लागर सम्मेलन है या किसी कंपनी के एजेंट का सम्मेलन है ? कोई जरूरी नहीं है कि सभी ब्लागर 4100 रुपये पंजीकरण शुल्क दे सकते हों, ब्लाग लिखने के लिए नौकरी करना जरूरी नहीं है। बहुत सारे स्टूडेंट भी ब्लागर हैं। वो भारी भरकम पंजीकरण शुल्क नहीं दे सकते। फिर आने जाने के अलावा दो तीन हजार रूपये जेब खर्च भी जरूरी है। ऐसे में जिसकी जितनी लंबी चादर है वो उतना ही पैर फैलाएगा ना। ऐसे में भला इसे ब्लागर सम्मान समारोह कैसे कहा जा सकता है ?    

हास्यास्पद तो ये है कि बेचारे सम्मानित होने वालों की सूची एक साथ जारी नहीं कर सकते। वजह जानते हैं, जिनका पंजीकरण शुल्क नहीं आया है, उनके नाम पर विचार कैसे किया जा सकता है? अभी पंजीकरण 13 अगस्त तक खुला हुआ है, मतलब सम्मानित होने वालों के नाम का ऐलान तब तक तो चलता ही रहेगा। मैं देख रहा था कि जो नाम जारी हुए हैं, ये वो नाम हैं जो मई में ही सम्मान समारोह में जाने का कन्फर्म कर शुल्क भी जमा कर चुके थे, इसलिए सम्मान की सूची में उनके नाम आने लगे हैं। वैसे सम्मान की सूची वहां जब जारी होगी तब देखा जाएगा, लेकिन कुछ नाम तो मुझे भी पता है जिनका नाम जल्दी ही जारी होने वाला है। हां अगर आपको भी नाम जानना है तो उस पोस्ट पर चले जाएं, जहां बताया गया था कि इन-इन ब्लागरों ने आना कन्फर्म कर दिया है, जिनके नाम कन्फर्म समझ लो सम्मान तय है। क्योंकि एक्को ठो ऐसा ब्लागर नहीं मिलेगा जिसको सम्मान ना मिल रहा हो, फिर भी ऊ काठमाडू जा रहा हो।

अब देखिए, जो ब्लागर देर से पंजीकरण करा रहे हैं वो बेचारे तो बड़े वाले सम्मान से चूक गए ना, जिसमें कुछ रकम भी मिलनी है। लेकिन है सब घपला। ध्यान देने वाली बात ये है कि सम्मान कार्यक्रम में बाकी सब बता दिया, ये किसी को नहीं मालूम कि निर्णायक मंडल में कौन कौन है ? अच्छा निर्णायक मंडल के पास ब्लाग का नाम भेजा गया है, ब्लागर का नाम भेजा गया है या फिर ब्लागर का लेख, कहानी, कविता क्या भेजी गई है, जिस पर अदृश्य निर्णायक मंडल निर्णय ले रहा है। ये तो आप जानते हैं कि कोई निर्णायक मंडल पूरा ब्लाग तो देखने से रहा। अगर उनके पास रचनाएं भेजी गईं है, तो सवाल उठता है कि ये रचनाएं ब्लागरों से आमंत्रित किए बगैर कैसे भेजी जा सकती है। दरअसल इन सब के खेल को समझ पाना बड़ा मुश्किल है। अच्छा हिंदी वाले तो ज्यादातर लोग समझ गए हैं इनकी चाल को, तो अब इसका दायरा बढ़ाना था। इसलिए कह रहे हैं कि इस बार भोजपुरी, मैथिल और अवधी को भी सम्मान दिया जाएगा। लग रहा है कुछ नए ब्लागर और फस गए हैं। वैसे इनकी नजर में नेपाली भाषा भी क्षेत्रीय भाषा है, इसमें भी सम्मान की संभावना है।

खैर छोड़िए, जिसकी जैसे चले, चलती रहनी चाहिए। इतनी बातें लिखने का मकसद सिर्फ ये है कि आप सब कोई मूर्ख थोड़े हैं, सजग रहिए। आप ब्लागर है, पढे लिखे लोग है। आपको अपनी बौद्धिक हैसियत नहीं पता है ? अब तक सम्मान के लिए कुछ नाम जो सामने आए है, दो एक लोगों को छोड़ दीजिए, बाकी लोग दिल पर हाथ रख कर सोचें कि क्या उनकी लिखावट में इतनी निखार है कि वो सम्मान के हकदार हैं। नेपाल जाना है, बिल्कुल जाइए, लेकिन इस फर्जीवाड़े के लिए नहीं, बच्चों को साथ लेकर बाबा पशुपतिनाथ के दर्शन कीजिए, हो  सकता है कि उनके आशीर्वाद से लेखनी में और निखार आ जाए। हैराऩी इस बात पर भी हो रही है कि कुछ ब्लागर मित्र जो पिछले सम्मान के दौरान मुझे इसकी खामियां गिनाते नहीं थकते थे और आयोजकों को गाली दे रहे थे वो आज उनके सबसे बड़े प्रशंसक हैं। चलिए आज बस इतना ही इस मामले में तो आगे भी आपसे बातें होती रहेंगी।






/a>
FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
XXX +24 <

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें