मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

To LoVe 2015: पटना धमाका : बात सिर्फ मोदी की नहीं

    पटना में धमाकों के बीच नरेंद्र मोदी ने सफल हुंकार रैली की.....बिहार की धरती पर नरेंद्र मोदी का रैली का सपना कई महीनों से अटका हुआ था। धमाकों से मोदी की रैली को रोकने की नापाक कोशिश भी नाकाम हो गई...मगर धमाकों के बाद नेता लगातार पोलिटिकल धमाके कर रहे हैं। कोई  सुधरने को तैयार नहीं। नेताओं की फिसलती जुबान पर कोई रोक नहीं है। ब्लास्ट के बाद नेता आतंकवाद से लड़ने की बात करने की बजाए आपस में ही लड़ रहे है…जबकि  परेशान करने वाली बात यह है कि मोदी कि रैली में धमाके हुए कैसे?
   धमाकों के लिए बिहार सरकार या प्रशासन को ही दोष देना बेमानी है। समस्या पुरे सिस्टम की है। हमारे देश के लिए आतंकवाद एक बड़ी मुसीबत इसलिए है क्योंकि हमारे पड़ोस में कई अराजक औऱ नापाक मुल्क हैं जहां से आतंकवादियों को पूरी मदद मिलती है। उसपर भारी मुसीबत ये है कि विदेशी आतंकवादियों को देश के भीतर से भी मदद मिल रही है। पटना स्टेशन पर पहले विस्फोट में जो आतंकवादी मरा था वह भारतीय था..वहां से भागते हुए जो आतंकवादी पकड़ा गया वो भी भारतीय ही था। जो मास्टरमाइंड है वो भी भारतीय ही है। इन सबको आर्थिक मदद पाकिस्तान से और ट्रैनिंग बांग्लादेश से मिलती है।
    ऐसे में कड़ी चौकसी से ही ऐसी घटनाओं पर काबू पाया जा सकता है.…मगर ब्लास्ट के तुरंत बाद राज्य सरकार पुराना राग अलापने लगी थी कि उन्हें केंद्र ने कोई अलर्ट नहीं दिया था। बाद में केंद्र और खुफिया एजेंसियों कि रिपोर्ट्स ने राज्य सरकार के दावों की पोल खोल दी। भटकल की गिरफ्तारी के बाद से ही इस बारे में शायद अलर्ट जारी कर दिया गया था। दरअसल केंद्र और राज्य कि मशीनरी में तालमेल की कमी का नतीजा हैं ऐसी घटनाएं। केंद्रिय खुफिया एजेंसियां अक्सर राज्यों की पुलिस की गफ़लत और धमाकों के बाद काम करने के तरीकों पर उंगलियां उठाती रही हैं। मसलन इस बार जिस तरह से जिंदा बमों को डिफ्यूज करने की जगह उसमें बिहार पुलिस ने धमाके करा दिए उससे बम के बनाने के तरीकों के बारे में पता चलने से एजेंसियां वंचित रह गईं। इसके अलावा पटना में धमाकों के दो दिन बाद फिर तीन जिंदा बम मिलना पुलिस के काम करने के तरीकों पर सवाल उठाता है।
   ये काफी चिंता की बात है कि सूरक्षा के ऐसे लचर प्रबंध मोदी की रैली में हुए। सवाल किसी पार्टी या नेता विशेष का नहीं है। सवाल देश के राजनैतिक नेतृत्व का है। देश का सारा राजनैतिक नेतृत्व आतंकवादियों के निशाने पर है। सोनिया गांधी, राहुल गांधी, लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी आतंकवादियों की हिटलिस्ट में सबसे ऊपर हैं। इसलिए इन नेताओं की सुरक्षा में किसी तरह की कोताही नहीं की जानी चाहिए। ऐसे में जब भविष्य में देश की अगुवाई करने वाले सभी संभावित नेता आतंकवादियों की हिट लिस्ट में हैं तो इन पार्टियों के नेताओं को बचकानी बयानबाजी नहीं करनी चाहिए।
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