शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

To LoVe 2015: सरकारी विभाग भी काम करते हैं


कभी-कभी खबरों की आंधी के बीच कुछ ऐसी खबरें रह जाती हैं जो बेहद अहम होती हैं। ये खबरें देश के एकाध फीसदी वोटरों को ही प्रभावित करती हैं। खासतौर पर विदेश और आर्थिक नीतियों औऱ समझौतों के बारे में आम वोटर नहीं जानता। जबतक उसपर इसका दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, वो इसबारे में नहीं सोचता, औऱ न ही विदेश औऱ अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक समझौतों के बारे में सोच कर वोट डालता हैं। वरना  WTO की बैठक में हमारे देश के विरोध के कारण अमेरिका और बाकी देशों की मनमर्जी नहीं चल पाने की खबर मुख्य खबरों की भीड़ में निचले पायदान पर नहीं होती।   

    WTO में विकसित देश इस फैसले पर मुहर लगवाना चाहते थे कि विकासशील देश गरीबों को खाने में 10 फीसदी से ज्यादा की छूट न दें। मतलब ये कि अमेरिका समेत सभी विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश की सरकारें खाद्यान पर 100 रुपये पर 10 रुपये से ज्यादा का घाटा न उठाए। जबकि सिर्फ हमारे यहां ही ऐसे हालात हैं कि अगर सरकार कई चीजों पर सब्सीडी बंद कर दे तो गरीब तो छो़ड़िए मध्यवर्ग के लिए भी जीना मुश्किल हो जाएगा...जाहिर है जिस देश में अस्सी करोड़ लोगो को खाना ठीक से नसीब न होता हो वहां ऐसे समझौते करोड़ों लोगो का बेड़ा गर्क कर देते।

   इस कामयाबी से कांग्रेस ने राहत की सांस ली होगी। दरअसल कांग्रेस ने हाल ही में सोनिया गांधी की महत्वाकांक्षी खाद्य सुरक्षा कानून को मंजूरी दी है। जिसके तहत आज की तारिख में गरीब लोगो चावल 24 फीसदी स्रस्ता और गेूहं 28 फीसदी सस्ती दर पर मिलेगा। ऐसे में अगर सब्सीडी के मुद्दे पर विकसित देशों की चलती तो भारत में इस योजना को जारी रखना बेहद मुश्किल हो जाता। 

    भारत के प्रतिनिधी दुनिया भर में बौद्धिक संपदा के पेंटेंट के नाम पर होने वाली धांधलियों के खिलाफ डटकर खड़े रहते हैं। इस मसले पर संबंधित सरकारी विभाग के अधिकारी कड़ी मशक्कत करते हैं। अगर ऐसा न होता तो सालों पहले बासमती चावल से लेकर हल्दी और नीम का पेड़ तक हमारे लिए पराए हो जाते। सिर्फ भारत के कड़े रवैये के कारण ही अमेरिका समेत सभी विकसित देशों की मनमर्जी नहीं चल पाती है। भारत में अंतर्रराष्ट्रीय नीति पर ज्यादातर हर पार्टी का रवैया कमोबेश एक ही है...और सियासी दल इन मुद्दों पर नीतियों में जल्दी बदलाव इसलिए भी नहीं करते है क्योंकि इन नीतियों से वोटर भारी तादाद में प्रभावित नहीं होते। अगर वोटर इन मुद्दों पर भी सोचने लगें तो विदेशी नीति भी ढुलमुल रहने लगेगी।  

    ये अलग बात है कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक सरकारी विभाग कड़ी मशक्कत के बाद सब्सीडी की सरकारी नीति को बरकार रखने में कामयाब होता है..तो देश के अंदर के सराकारी विभागों का भ्रष्टाचार सब्सीडी का फायदा वंचितों तक तक नहीं पहुंचने देता। 
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