रविवार, 12 जनवरी 2014

To LoVe 2015: Ariel Sharon-अलविदा भारत के मित्र


आठ साल कोमा में रहने के बाद इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री एरियल शैरोन का निधन हो गया...कहते हैं कि मरने के बाद इंसान की बुराई नहीं की जाती, मगर शैरोन की मौत के बाद अखबारों की हेडलाइन ने उन्हें कसाई औऱ जाने क्या-क्या लिखा..हैरत है कि ऐसा भारतीय अखबारों में भी पढ़ने को मिला.(butcher-of-beirut) जबकि शैरोन भारत के मित्र थे। उन्हीं के दौर में भारत औऱ इजराइल के रिश्ते सामान्य हुए थे। वो पहले इजराइली प्रधानमंत्री थे जिन्होंने भारत का दौरा किया था। जाहिर है ऐसे नेता का मूल्याकंन भारत के साथ उनके संदर्भ को देखते हुए करना चाहिए, न कि इजराइल के दुश्मन देश के नजरिए से। ये अलग बात है कि हमारा राजनैतिक नेतृत्व शैरोन के दुश्मन देश फिलिस्तीन का समर्थक था।
  शैरोन की मौत के साथ ही मुझे आठ-नौ साल पुरानी वो बात याद आ गई जब फिलिस्तीन और इजराइल से संबंधित खबरों में हमेशा मेरी दिलचस्पी रहती थी। मुख्य कारण यराफात थे जो हमारे देश की बेहद इज्जत करते थे। उन दिनों यराफात से समझौते के बाद मेरी नजरों में शैरोन की इज्जत ज्यादा बढ़ गई थी। आखिर एक सैनिक यौद्धा ने शांति की राह पर चलने का फैसला किया था। मैंने तब एक रिपोर्ट में शंका जताई थी कि अगर समझौते का पालन नहीं होगा तो शैरोन अपने पुराने रुख पर लौटने को मजबूर हो सकते है....पर शायद उपरवाले को ये मंजूर नहीं था। पहले संदिग्ध परिस्थितयों में यराफात दुनिया से कूच कर गए फिर शैरोन कोमा में चले गए।
   बचपन से यासिर यराफात की छवि हमारे मन में भारत के मित्र की थी। इंदिरा गांधी को वो बहन कहते थे। ये भी हकीकत है कि राजीव गांधी को उन्होंने पहले ही आगाह कर दिया था कि कुछ ताकतें उनकी जान लेना चाहती हैं। इसको लेकर अराफात इतने चिंतित थे कि जब उन्होंने खबरों में राजीव गांधी को सुरक्षा की परवाह किए बगैर चुनाव प्रचार करते देखा था तो विचलित हो गए थे। उन्होंने उसी वक्त किसी तरह राजीव गांधी से संपर्क करके उन्हें सुरक्षा में रहने को कहा था। खबरों के मुताबिक अराफात जब राजीव गांधी के अंतिम संस्कार में भारत आए तो उन्होंने राजीव हत्या की जांच में मदद की पेशकश भी की थी। लेकिन उसका क्या हुआ पता नहीं।
  हो सकता है कि मानवता की विशाल कसौटी पर शैरोन माफ नहीं किए जाएं..लेकिन इजराइल के लिए जो उन्होंने किया वो कोई भी राजनेता करता। हमारे देश के नजरिए से शैरोन एक मित्र थे। इसलिए एक मित्र देश के मित्र नेता के जाने पर हमें दुख होना चाहिएउनकी मौत पर बेरुत का हत्यारा जैसे शब्दों से अखबारों को परहेज करना चाहिए था। मेरी नजर में एरियल शैरोन का मूल्याकंन भारत के संदर्भ में है, औऱ इसी नजरिए से मैं भगवान से प्रार्थना करुंगा कि वो भारत के मित्र शैरोन की आत्मा को शांति प्रदान करे।
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