शनिवार, 4 जनवरी 2014

To LoVe 2015: क्या खतरनाक खेल में शामिल हैं केजरीवाल ?

ज सुबह से मित्रों के फोन आ रहे हैं और सब एक ही बात कह रहे हैं, भाईसाहब आप बिल्कुल सही कह रहे थे, अब हमें भी कुछ-कुछ समझ में आ रहा है, अरविंद केजरीवाल जो कह रहे हैं या कर रहे हैं वो सब महज दिखावा है, असल मकसद तो कुछ और ही लग  रहा है। दरअसल मैं तीन दिन लखनऊ में रहा, कुछ व्यस्तता के चलते खबरों से बिल्कुल कटा हुआ था। मित्रों ने ही मुझे फोन पर बताया कि केजरीवाल ने भी दिल्ली में फ्लैट पसंद कर लिया है, वो भी एक नहीं दो.. मैं चौंक गया कि दो फ्लैट क्यों ? पता चला कि अगल बगल के दो फ्लैट के पांच पांच कमरों को मिलाकर 10 कमरे का मुख्यमंत्री आवास तैयार किया जा रहा है। इन दोनों फ्लैट को लाखों रूपये खर्च कर चमकाने का भी काम  शुरू  हो गया है। बहरहाल न्यूज चैनलों पर खबर आई तो अब भाग खड़े हुए, कह रहे है, इससे छोटा आवास तलाशा जाए। अच्छा अभी इस मित्र ने फोन काटा ही था, दूसरे का फोन आ गया, कहने लगे अरे महेन्द्र जी आपका जवाब नहीं, जो आपने कहा था सब सामने आ रहा है। मैंने पूछा अब क्या हुआ, कहने लगे कि कल तक जो लोग मेट्रो और आटो में सफर करके न्यूज चैनलों की हेडलाइन बने हुए थे, आज सभी ने दिल्ली सरकार से इनोवा गाड़ी उठा ली, अब हर मंत्री शानदार लक्जरी गाड़ी पर चल रहा है। चलिए एक-एक कर सभी मुद्दों पर चर्चा करते हैं।

सबसे पहले केजरीवाल साहब के नए ठिकाने की बात करते हैं। दिल्ली के प्राइम लोकेशन भगवानदास रोड पर 7/6 डीडीए ऑफिसर्स कॉलोनी अब आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का नया पता बनने को तैयार हो रहा है। वैसे तो मुख्यमंत्री की हैसियत से वो लुटिंयन दिल्ली में एक शानदार बंगले के हकदार हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन खुद अरविंद ने ऐलान किया था कि उनका कोई भी मंत्री किसी तरह की सरकारी सुविधा यानि बंगला, मोटर, वेतन कुछ नहीं लेगा, हम सब सिर्फ जनता की सेवा करेंगे। लेकिन जब केजरीवाल ने पांच-पांच कमरों वाले दो फ्लैट लेने का फैसला किया तो दिल्ली वालों के कान खड़े हो गए। अरविंद केजरीवाल से पहले इस फ्लैट को देखने उनके माता-पिता पहुंच गए। सब ने ओके कर दिया, यहां तक कि इस फ्लैट को मुख्यमंत्री के रहने के काबिल बनाने के लिए लाखों रुपये पानी की तरह बहाने का फैसला भी हो गया और आनन-फानन में अफसरों ने काम भी शुरू कर दिया। खैर मीडिया में आज भी एक तपका ऐसा है जिसकी आंखे खुली हुई हैं। उसे लगा कि दिल्ली को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि अरविंद जो एक समय बड़ी - बडी बात कर रहे थे, दरअसल वो सच्चाई नहीं है, सच्चाई ये है कि अरविंद भी दूसरे राजनीतिक दलों और नेताओं से अलग नहीं है। खैर थोड़ी देर बाद टीवी पर अरविंद के शानदार फ्लैट की तस्वीर दिखाई जाने लगीं।

अब बारी थी अरविंद केजरीवाल की, दिल्ली वाले जानना चाहते थे कि आम आदमी के मुख्यमंत्री इस आरोपों का क्या जवाब देते हैं ? बहरहाल जवाब आया कि पहले जाकर शीला दीक्षित का आवास देखो फिर मेरे फ्लैट की तुलना करो। उनसे तो बहुत छोटा है मेरा फ्लैट। मुझे लगता है किसी आम आदमी के बीच के मुख्यमंत्री का इससे फूहड़ और गंदा जवाब हो ही नहीं सकता। इसका मतलब तो ये कि  मैं कहूं कि शीला ने मुख्यमंत्री रहते अगर भ्रष्ट तरीके से एक हजार करोड़ रुपये की हेराफेरी की है तो ढाई सौ करोड़ की हेराफेरी करने का आपका भी हक बन जाता है। क्यों केजरीवाल साहब आप ने ईमानदारी की ये नई परिभाषा गढ़ ली है। बहरहाल अभी केजरीवाल का कद उतना नहीं बढ़ा है कि मीडिया की पूरी तरह अनदेखी कर सकें। रात भर कुछ चैनल को छोड़कर ज्यादातर ने केजरीवाल को खूब खरी-खरी सुनाई और दिल्ली वालों को उनका असली चेहरा दिखाया, तब कहीं जाकर सुबह केजरीवाल मीडिया के सामने आए और कहा कि अब वो इस बड़े फ्लैट में नहीं रहेंगे। छोटा फ्लैट तलाशने के लिए अफसरों को कहा गया है। यहां एक सवाल है कि क्या केजरीवाल का भी मन डोल गया है सरकारी आवास को लेकर? क्या ये सच नहीं है कि मीडिया के दबाव में केजरीवाल ने ये फ्लैट छोड़ दिया, वरना तो उनके पापा मम्मी ने भी इस फ्लैट को ओके कर दिया था ?

अब दूसरी बात करते है, सरकारी गाड़ी को लेकर उनके विचार। केजरीवाल तीन दिन तक  ड्रामा करते रहे कि वो सरकारी गाड़ी नहीं लेगें, अपने निजी कार से दफ्तर जाएंगे। मीडिया ने उनके इस फैसले को बढ़ा चढ़ाकर खूब चलाया। तीन दिन तक हर चैनल पर उनकी नीले रंग की कार दौड़ती भागती दिखाई दे रही थी। न्यूज चैनल पर केजरीवाल भाषण देते रहे कि यहां से वीआईपी कल्चर खत्म करेंगे और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देंगे। ड्रामेबाजी का आलम ये कि केजरीवाल ने शपथ लेने के लिए आधा रास्ता मेट्रो से तय किया, बाद में अपनी कार से गए। हालाकि ये अलग बात है कि उनके लिए अलग ही मेट्रो ट्रेन की व्यवस्था की गई थी। अब उनके मंत्री दो कदम आगे निकले, वो सुबह उठते ही न्यूज चैनलों को फोन करते और बताते कि सुबह साढ़े नौ बजे घर से सचिवालय के लिए निकलेंगे और पहले आटो से मालवीयनगर मेट्रो स्टेशन जाएंगे, फिर मेट्रो से सचिवालय जाएंगे। अगर न्यूज चैनल के रिपोर्टर जाम में फंस गए तो मंत्री भी घर से नहीं निकल रहे थे। वो भी रिपोर्टरों के आने के बाद ही आटो पर बैठे। खैर ये ड्रामा भी ज्यादा दिन नहीं चल पाया। अब मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों के पास शानदार सरकारी लक्जरी गाड़ी है। सभी गाड़ियों पर वीवीआईपी नंबर है। मैं पूछना चाहता हूं कि केजरीवाल साहब ये तीन दिन अपनी बैगनआर कार पर चल कर आप क्या बताना चाहते थे ? क्या ये कि आपके पास भी कार है ! अब आपके मंत्रियों ने भी कार लपक ली, कहां गया आपका पब्लिक ट्रांसपोर्ट प्रेम ?

अच्छा आप पानी बिजली पर बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं। जनता को हकीकत क्यों नहीं बताते। आपने जिस तपके यानि मीडिल क्लास को ध्यान में रखकर पानी की बात की, पूरी दिल्ली जानती है कि आपके फरमान से उसे कोई फायदा नहीं होने वाला है। दिल्ली में झुग्गी झोपड़ी या फिर अवैध कालोनी में पानी पहुंच ही नहीं रहा है, मीटर की तो बात ही दूर है। हां मीडिल क्लास तपका हाउसिंग सोसाइटी में रहते हैं, जहां सबके अलग-अलग कनेक्शन नहीं है, पूरी सोसाइटी का एक कनेक्शन है। ऐसे में मुझे तो नहीं लगता कि किसी को फायदा होगा। दूसरा आपने बिजली के बिल को आधा करने की बात की थी, लेकिन अब उसमें चालाकी कर दी आपने। चुनाव के पहले आपने बिजली कंपनियों को चोर बताया था और कहा था कि इन पर शिकंजा कसा जाएगा। हो क्या रहा है कि आप ने तो इन्हीं बिजली कंपनियों को करोडो रुपये सौंपने की तैयारी कर ली। बिजली का बिल कम करने के लिए सब्सिडी का क्या मतलब है ? केजरीवाल साहब सब्सिडी आप अपने घर से नहीं हमारी जेब से दे रहे हैं। हमारे टैक्स के पैसे जिसे कहीं विकास के काम में लगाया जा सकता था, वो पैसा आप बिजपी कंपनियों को दे रहे हैं, फिर मेरा सवाल है कि अब आप में और कांग्रेस में अंतर क्या है ? दोनों के लिए ही आम आदमी से कहीं ज्यादा बिजली कंपनियो की फिक्र है। फिर बड़ी बात तो ये है कि अभी तो बजट पास नहीं हुआ, आपके पास पैसे ही नहीं है, ऐसे में आप सब्सिडी दे कैसे सकते हैं ? केजरीवाल साहब कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको दिल्ली सरकार के घाघ अफसर मूर्ख बना रहे हैं ?

वैसे आप अपनी बातों पर ज्यादा समय तक कायम नहीं रह पाएंगे, इस बात का आभास तो आपके शपथ ग्रहण समारोह में ही हो गया था। आप ने कहाकि सादगी से समारोह होगा, कोई वीआईपी नहीं होगा, सब आम आदमी होंगे। केजरीवाल साहब आपकी आंखों पर पट्टी पड़ी हुई थी क्या ? आपने देखा नहीं कि आम आदमी रामलीला मैदान में किस तरह से धक्के खा रहा था और खास आदमी सोफे और शानदार सफेद कवर चढ़ी कुर्सियों पर विराजमान था। क्या आप अभी भी इस बात से इनकार कर सकते हैं कि आपके समारोह में खास लोगों के लिए वीआईपी इंतजाम नहीं था ? हां भूल गया था, आप सुरक्षा को लेकर भी काफी कुछ कहते रहे हैं। पुलिस विभाग के रिकार्ड बता रहे हैं कि आपकी सुरक्षा में काफी पुलिस बल शामिल है। अगर आप सुरक्षा लेते तो 10-20 पुलिस कर्मी आपके साथ हो जाते, लेकिन सुरक्षा ना लेने की वजह से जहां से आप का आना जाना होता है, उस पूरे एरिया में सुरक्षा बलों को तैनात किया जाता है। बताते हैं की तीन सौ से चार सौ पुलिस वाले आपके आस पास रहते हैं। इससे तो बेहतर यही होता कि आप सुरक्षा ले लें। खैर ये वो बातें हैं जो आप दावा करते रहे और खोखली साबित हुई..

केजरीवाल साहब अब मैं कुछ गंभीर मुद्दा उठाना चाहता हूं। विधानसभा के भीतर आप पर एक गंभीर आरोप लगा, कि आप ने अपने एनजीओ में विदेशों से चंदा लिया। आप जिससे चंदा लेते हैं उसके क्रिया कलाप जानने की कोशिश करते हैं? मेरी जानकारी है कि ये संस्थाएं   लोकतंत्र को अस्थिर करने का काम करती हैं। मेरा सवाल है कि विधानसभा में आपने इस आरोप का जवाब क्यों नहीं दिया ? विधानसभा के रिकार्ड में आप पर आर्थिक धांधलेबाजी के आरोप दर्ज हो गया है। लेकिन उस दौरान आप मौजूद थे, फिर भी इस पूरे मामले में खामोश हैं, दिल्ली की नहीं देश की जनता सच्चाई जानना चाहती है। कुछ बातें हैं जो आपको जानना जरूरी है।

केजरीवाल का  काला सच !

दरअसल अमेरिकी नीतियों को पूरी दुनिया में लागू कराने के लिए अमेरिकी खुफिया ब्यूरो  ‘सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए)’ अमेरिका की मशहूर कार निर्माता कंपनी ‘फोर्ड’ द्वारा संचालित ‘फोर्ड फाउंडेशन’ और कई अन्य फंडिंग एजेंसी के साथ मिलकर काम करती है। 1953 में फिलिपिंस की पूरी राजनीति और चुनाव को सीआईए ने अपने कब्जे में ले लिया था। भारत अरविंद केजरीवाल की ही तरह सीआईए ने उस वक्त फिलिपिंस में ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ को खड़ा किया था और उन्हें फिलिपिंस का राष्ट्रपति तक बनवा दिया था। अरविंद केजरीवाल की ही तरह ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ का भी पूर्व का कोई राजनैतिक इतिहास नहीं था। उन्हीं ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ के नाम पर एशिया में अमेरिकी नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने वालों, वॉलेंटियर तैयार करने वालों, अपने देश की नीतियों को अमेरिकी हित में प्रभावित करने वालों, भ्रष्‍टाचार के नाम पर देश की चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने वालों को ‘फोर्ड फाउंडेशन’ व ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ मिलकर अप्रैल 1957 से ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ अवार्ड प्रदान कर रही है। ‘आम आदमी पार्टी’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल को वही ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार मिल चुका है और सीआईए के लिए फंडिंग करने वाली उसी ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के फंड से उनका एनजीओ ‘कबीर’ और ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ मूवमेंट खड़ा हुआ है।

‘फोर्ड फाउंडेशन’ के एक अधिकारी स्टीवन सॉलनिक के मुताबिक ‘‘कबीर को फोर्ड फाउंडेशन की ओर से वर्ष 2005 में 1 लाख 72 हजार डॉलर एवं वर्ष 2008 में 1 लाख 97 हजार अमेरिकी डॉलर का फंड दिया गया।’’ यही नहीं, ‘कबीर’ को ‘डच दूतावास’ से भी मोटी रकम फंड के रूप में मिला है। अमेरिका के साथ मिलकर नीदरलैंड भी अपने दूतावासों के जरिए दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी-यूरोपीय हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए वहां की गैर सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ को जबरदस्त फंडिंग करती है। अंग्रेजी अखबार ‘पॉयनियर’ में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक डच यानी नीदरलैंड दूतावास अपनी ही एक एनजीओ ‘हिवोस’ के जरिए नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को अस्थिर करने में लगे विभिन्‍न भारतीय एनजीओ को अप्रैल 2008 से 2012 के बीच लगभग 13 लाख यूरो, मतलब करीब सवा नौ करोड़ रुपए की फंडिंग कर चुकी है।  इसमें एक अरविंद केजरीवाल का एनजीओ भी शामिल है। ‘हिवोस’ को फोर्ड फाउंडेशन भी फंडिंग करती है।

डच एनजीओ ‘हिवोस’  दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में केवल उन्हीं एनजीओ को फंडिंग करती है,जो अपने देश व वहां के राज्यों में अमेरिका व यूरोप के हित में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की क्षमता को साबित करते हैं।  इसके लिए मीडिया हाउस को भी जबरदस्त फंडिंग की जाती है। एशियाई देशों की मीडिया को फंडिंग करने के लिए अमेरिका व यूरोपीय देशों ने ‘पनोस’ नामक संस्था का गठन कर रखा है। दक्षिण एशिया में इस समय ‘पनोस’ के करीब आधा दर्जन कार्यालय काम कर रहे हैं। 'पनोस' में भी फोर्ड फाउंडेशन का पैसा आता है। माना जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल के मीडिया उभार के पीछे इसी ‘पनोस' के जरिए 'फोर्ड फाउंडेशन' की फंडिंग काम कर रही है।


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