शनिवार, 1 मार्च 2014

To LoVe 2015: Election 2014-कांग्रेस..बीजेपी-प्रचार का रथ रफ्तार में

देर से ही सही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की प्रचार गाड़ी ने भी रफ़्तार पकड़ ली है। मीडिया औऱ रेडियो चैनलों पर रागा प्रयार एक्सप्रेस सरपट दौड़ रही है। हालांकि साइबर की दुनिया खासकर ब्लॉग्स, फेसबुक और टिव्टर पर नमो के दर्शन ज्यादा हो रहे हैं। पुरानी कहावत है कि पहले मारे सो मीर। मिशन 2014 में ये कहावत मोदी एंड पार्टी पर सटीक बैठ रही है।
नरेंद्र मोदी-हो गई है बल्ले बल्ले
महीनों पहले ही चुनावी प्रचार में जुट जाने के कारण मोदी चर्चा के केंद्र में हैं। दस साल तक सकते में रहने के बाद बीजेपी का काडर एकजुट होकर पूरी ताकत से मोदी के साथ चुनावी मैदान में कूद चुका है। अमेरिका भी मोदी तक पहूंच बना रहा है। भारत अमेरिका के लिए बड़ा बाजार है। इस बाजार को चलाने वाली नई ताकतों में अधिकतर का झुकाव मोदी के पक्ष में हैं। जिस कारण अमेरिका को अब मोदी से कोई परहेज नहीं है। अमेरिका कुछ भी दावा करे...सच ये है कि अमेरिका पहले अपना फायदा देखता है।
राहुल गांधी-देर कर दी मेहरबां
बीजेपी के उलट दस साल तक सत्ता में रहने के बाद भी कांग्रेस का काडर अस्त-व्यस्त है। खासकर यूपी औऱ बिहार में।(Rahul & UP) कांग्रेस में दूसरी कतार के राष्ट्रीय छवि और राज्य स्तर के नेताओं का अकाल है। एक मुसीबत खुद राहूल गांधी की खड़ी की हुई है। कई बार ऐसा लगा कि वो खुलकर कमान संभालेंगे, मगर उन्होंने कह दिया कि उनकी पार्टी के लोकसभा सदस्य चाहेंगे, तो वो प्रधानमंत्री बनेंगे। संविधान की लाइन के पीछे ख़ड़े राहूल की बात तो ठीक है, लेकिन वर्तमान हालात के विपरित। बेहतर है कि राहूल गांधी फिलासफर की छवि छोड़ें...क्योंकि जनता उस राजनेता को ढूंढ रही है, जो सीधे-सीधे बात करे। यही नहीं राहुल गांधी जो मांगे आज मान रहे हैं, अगर वो पहले मान लेते, तो उसका फायदा कांग्रेस को ज्यादा होता। अब लोग यही सोच रहे हैं कि चुनाव नजदीक है, इस कारण ये मांगे मानी गई हैं। चाहे रिटायर सैनिकों कि एक रैंक, एक पैंशन की मांग हो या फिर एक साल में 12 सिलिंडर की बात हो। (राहुल अहम पड़ाव पर)
बीजेपी-कांग्रेस की नीतियों पर जनता भ्रमित
विदेश नीति से लेकर, अर्थव्यवस्था को तक कांग्रेस की नीति साफ है। वोटों की राजनीति औऱ अंतर्राष्ट्रीय हालात के दवाब के बीच कांग्रेस की एक नीति है। बावजूद इसके कांग्रेस कि नीतियां से आज जनता ज्यादा उत्साहित नहीं है। ठीक उलट, बीजेपी का अर्थव्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय नीतियों का रोडमैप अबतक जनता को साफ नहीं मालूम। यानि केवल प्रचार के दम पर मोदी अपनी कमजोरी को ताकत में बदल चूके हैं। कांग्रेस औऱ राहूल गांधी को देर से शुरु हुए प्रचार अभियान ने बैकफुट पर धकेल दिया है। (मोदी-राहूल आगे देखें प्लीज) 
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