सोमवार, 17 मार्च 2014

To LoVe 2015: Happy Holi..हो ली ..अब !


    रंगो का त्यौहार होली लोगो ने जमकर मनाई। मुझे भी इस मौके पर कई लोगो ने बधाई दी, लेकिन हर बार की तरह दिल्ली में कई लोग घरों में ही बंद रहे। घरों में बंद ये रंगों से ऐसे बच रहे थे, जैस उन्हें कोई रंग लगा देगा, तो अनर्थ हो जाएगा। कई तो काले बुच्च हैं..पर कहते हैं गहरे रंग से उन्हें एलर्जी है। अब आर्गेनिक कलर से कैसे एलर्जी होती है ये तो भगवान जाने। हद है यार...कम्बखतों यही तो वो त्यौहार है, काले गोरे होते हैं, औऱ गोरे काले। ये सभी घरों में ऐसे छुपे रहे, जैसे ओसामा बिन लादेन छुपा हुआ था। सुखद ये रहा कि बच्चों कि टोलियां अपना काम कर रही थी। सारे बच्चे गलियों को रंगों से सराबोर करने में जुटे थे। जबकि इनके माता-पिता कि समझ में नहीं आ रहा था कि घर में घुसे रहकर वो एक शानदार परंपरा का कत्ल कर रहे थे। दस साल पहले तक तो मुझे याद है कि मुहल्ले के लोगों का एक झुंड बनता था..जो घर-घर जाकर लोगो को अबीर लगाता था। ऐसे में अगर कोई अकेला भी रहता था, तो भी उसतक त्यौहार की खुशी पहुंच जाती थी। मगर समय के साथ ये रिवाज कम हो रहा है। ये समाजिक त्यौहार भी धीरे-धीरे "मैं-मेरा" का शिकार हो चला है।
   माना दशकों पहले शहर में छोटे होते घरों ने लोगो को अलग-अलग रहने के लिए मजबूर कर दिया था, मगर ये मजबूरी आदत क्यों बन गई है? दोस्तों औऱ परिवार से एक स्थायी सी दूरी वाला रिश्ता क्यों बनाए बैठे हैं? उसपर तुर्रा ये है कि इसे सब सहज मानने लगे हैं। हां, एक अच्छी बात ये रही कि तीन दिन की छुट्टी में कई लोग मथुरा, वृंदावन जाकर होली मना आए। पंरपरा का ये जरुरी औऱ आर्थिक हिस्सा कायम है।
   लोग नए साल की मुबारक सड़क चलते अनजानों को भी देते हैं, लेकिन अपनों और पड़ोसियों से बेरुखी वाला व्यवहार अपनाने लगे हैं। लगता है कि पत्थरों के शहर में रहते-रहते सब पत्थर होते जा रहे हो। समाज प्राकृतिक रंगों की जगह प्लास्टिक रंगों की चमक से चमक रहा है। किसी को इस बात की फिक्र नहीं है। ठीक है कि बाजार ने होली महोत्सव जैसे आयोजन कर रंगो को गायब नहीं होने दिया है...लेकिन दायरे में कैद रंग में आपको कभी अपनेपन का प्यार दिखता है? जिन रंगों में प्यार नहीं होता है, वो रंग चेहरे को सजाते नहीं, बदरंग कर देते हैं।
   ये ठीक है कि वक्त फिर से हमें हमारी धरोहर की तरफ मोड़ देगा। मगर खतरा इस बात का है कि कहीं ऐसा न हो कि जब वक्त हमें उस धरोहर की तरफ मोड़े....हम उसका आनंद उठाने का तरीका भूल चुके हों। इसलिए हाथ पर हाथ रखने से काम नहीं चलने वाला। अपने जीवन औऱ अपने आसपास असली रंगों को जगह दो। प्लास्टिक रंगों से छुटकारा पाकर अपनेपन के रंग से सबको रंग दो। ये करना मुश्किल नहीं है। जितना जल्दी हो सके जाग जाओ..वरना हम अपनी खूबसूरत परंपरा से दूर हो जाएंगे।
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FuLl MoViEs
MoViEs To mOvIeS
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