रविवार, 13 अप्रैल 2014

To LoVe 2015: मुलायम सिंह यादव के बहाने...

हमारा समाज आधा तीतर, आधा बटेर है
आज जब भारत का यान मंगल ग्रह तक का आधा रास्ता तय कर चुका है तो हमारे नेता पिछली सदी की तरफ भाग रहे हैं। यानि दुनिया चले अगाड़ी हमारे नेता चले पिछाड़ी। अब जैसा नेताजी कहेंगे वही बात उनके सिपहसलार कहेंगे। यूपी में नेताजी ने कहा कि लड़कों से गलती हो जाती है..वो गलती से रेप कर देते हैं...इसके लिए फांसी दे दी। बस नेताजी ने बयान दिया, उधर मुंबई में उनकी पार्टी के अध्यक्ष अबू आजमी ने कह दिया कि पुरुष के साथ मर्जी से सेक्स संबध बनाने वाली लड़की को भी फांसी दे देनी चाहिए। जब उनपर मार पड़ने लगी तो आजमी ने कहा कि उन्होंने इस्लाम के हिसाब से कहा था। आजमी साहब धर्म की दुहाई ऐसे दे रहे थे जैसे भारत में तालीबानी राज हो। इन नेताओं की नई पीढ़ी भी असमंजम में फंस गई। उनसे न डिफेंड करते बना, न विरोध करते। आजमी के बेटे ने पहले विरोध किया, बाद में खबरों के मुताबिक वो भी धर्म की आड़ में पिता को बरी करते दिखे।
    ऐसा ही हाल नेताओं को चुनने वाली जनता का भी है। एक बात पर हल्ला मचता नहीं कि सब सियारों की तरह मिलकर हुआ-हुआ करने लगते हैं। इस हल्ले में गंभीर बातें हवा हो जाती है। नेता यही चाहते हैं। इसी चाल में युवा पीढ़ी के माउथपीस और अपने को आधुनिक समझने वाले लोग भी फंस जाते हैं। मुलायम सिंह कानून के दुरुपयोग की बात करके वाहवाही लूटना चाहते थे, पर रेपिस्ट को मिली फांसी की सजा का विरोध कर बैठे। बस मच गया हल्ला। हो गई कानून के दुरुपयोग की बात गायब।

  दरअसल पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें कानून का दुरुपयोग हुआ है।  दिल्ली हाईकोर्ट भी ऐसे मामलों की बढ़ोतरी पर चिंता जता चुका है। उसने अपने एक आदेश में कहा है कि ऐसे मामलों में गंभीरता से पुलिस इन्क्वायरी करके केस फाइल करनी चाहिए।
 हमारा समाज जितना भी आधुनिक होने का दावा कर ले मगर उसकी सोच अब भी 20वीं शताब्दी की है। एक बार कोई व्यक्ति झूठे रेप केस में फंस जाता है तो उसकी इज्जत का तियापांचा हो जाता है। अदालत से बाइज्जत बरी होने के बाद भी उसका समाजिक रुतबा उसे वापिस नहीं मिलता। समाज अघोषित रुप से उसका बहिष्कार कर देता है। झूठा आरोप लगाने वाली महिला को कानून कोई सजा नहीं देता। हैरानी होती है ऐसी विसंगता पर। ये ठीक है कि महिलाओं के लिए दुनिया भर में जीना आसान नहीं होता। मगर सच्चे औऱ ईमानदार आदमी के लिए भी रेप के झूठे आरोप में फंस जाने के बाद जीना आसान नहीं होता। 
   ये भी एक हैरानी वाली बात है कि पढ़ी लिखी लड़कियां शादी के सब्जबाग में फंस जाती है। अगर ऐसा ही होना है तो पढ़ने लिखने का फायदा क्या? यही हाल लिव-इन-रिलेशनशिप का है। जब कोई जोड़ा लिव-इन में रहने का फैसला करता है तो अपने को आधुनिक औऱ खुली सोच का मालिक बताता है। मगर जब इस रिश्ते से एक जना बाहर आना चाहता है तो दूसरा अलग होने की जगह अपने को उसपर थोपने की कोशिश करने लगता है। उस वक्त कहां चला जाता है आधुनिक और खुली सोच का दावा? जीवन जीने के स्टाइल का ये ऐसा नियम है जिसका सिर तो पाशाचात्य सभ्यता का है मगर धड़ भारतीय सभ्यता का। यानि आधा तीतर, आधा बटेर वाला नियम।
    हमारे समाज में यूरोपीय औऱ भारतीय परंपरा की खिचड़ी बनाकर खाने का चलन बढ़ा है। इसी उधेड़बुन के चक्कर में ऐसे कानून बन जाते हैं जिनका उद्देश्य कुछ होता है, मगर उसका व्यवहारिक धरातल पर असर उल्टा हो जाता है। यानि दो रंगे समाज में हम जी रहे हैं। हमारा समाज पूरी तरह से कन्फ्यूज है। हमें इस दोराहे पर खड़ा रहने कि जगह एकराह पकड़नी होगी। जबतक ये नहीं होगा, नेता वोट की खातिर उलटे-पुलटे कानून बनाते रहेंगे..और जबतब धर्म औऱ रीति रिवाजों के नाम पर नेता हमें मूर्ख बनाते रहेंगे औऱ हम उनकी चाल में फंसकर हुआ-हुआ करते रहेंगे।
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