शनिवार, 26 अप्रैल 2014

To LoVe 2015: मोदी ..इंदिरा गांधी....दंबगई मिलती-जुलती है क्या?

    आजकल भारत कि फिंजा में कुछ लाइनों का शोर है। जैसे, मोदी अधिनायकवादी हैं...करोड़ों लोग अल्पसंख्यक हैं...अमीर घरानों के हाथ में सबकुछ सौंप दिया जाएगा..वगैरह..वगैरह। 1977 के बाद पहली बार किसी नेता के खिलाफ में देश भर में गोलबंदी की कोशिशें हो रही हैं। जबकि गोलबंदी देश के विकास, बेरोगारी, बढ़ती महंगाई, बिगड़ते पर्यावरण, बढ़ती जनसंख्या, बच्चों को मिल रही शिक्षा, गरीबों तक इलाज की पहुंच जैसे मुद्दों पर होनी चाहिए थी। ये मुद्दों सुनाई तो देते हैं, पर धर्म के हल्ले और व्यक्तिगत आरोपों की झड़ी के बीच लापतागंज पहुंच गए हैं।
   नरेंद्र मोदी को लगातार सांप्रदायिक कहा जा रहा है। अगर ऐसा है तो गुजरात की जनता भी सांप्रदायिक है, जो उन्हें लगातार तीन बार सत्ता सौंप रही है। हकीकत ये है कि भारत में कोई तानाशाह शासन नहीं कर सकता। देश का विस्तार औऱ संस्कृति किसी कट्टर को बर्दाश्त नहीं करती। मोदी को लेकर कितनी भी आशंका हों, मगर ये सोचना कि वो कट्टर होकर शासन कर पाएंगे, बेवकूफी होगी। उल्टा मोदी की सख्त व्यक्ति औऱ शासक की जो छवि अबतक सामने आई है, वो इस वक्त देश की जरुरत है। जब भी केंद्र में कोई ताकतवर शख्सियत बैठती है तब देश पर इसका असर होता है।
   याद कीजिए दंबग इंदिरा गांधी को, जिनकी राजनीतिक सूझबूझ के कायल उनके विरोधी भी थे। बैंकों के राष्ट्रीयकरण और राजाओं के मोटे प्रिवीपर्स का खात्मा किया था उन्होंने। रशिया से दोस्ती करके अमेरिका को बंगाल कि खाड़ी से बाहर ही रोककर पाकिस्तान को उसकी औकात याद दिला थी। बाद में यही इंदिरा गांधी अनजानी असुरक्षा में घिर गई। चुनाव रद्द होने के बाद उन्होंने देश में इमरजेंसी लगा दी।
    दो साल तक इमरजेंसी लगी रही। उसके बाद इंदिरा गांधी ने तब चुनाव कराया था जब उन्हें विश्वास हो गया था कि कांग्रेस के पक्ष में माहौल है। इंदिरा गांधी को मिली खुफिया रिपोर्ट भी यही कह रही थी। इसके बाद उन्होंने चुनाव करवाए। नतीजा उल्टा निकला। गुस्साई जनता ने छिंदवाड़ा को छोड़कर पूरे उत्तर भारत से कांग्रेस का बोरिया बिस्तर गोल कर दिया। एक समय इन्हीं इंदिरा गांधी की राजनीतिक सूझबूझ की वजह से हताश विपक्षी नेताओं को कहना पड़ा था कि शुक्र मनाइए जवाहर लाल ने बेटी पैदा की, बेटा नहीं। तस्वीर का दूसरा रुख यह था कि इन्हीं इंदिरा गांधी ने किसी भी कांग्रेसी नेता का कद बड़ा नहीं होने दिया। जिसके कारण कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर के नेता पनप नहीं सके औऱ नतीजतन आज कांग्रेस पूरी तरह से गांधी परिवार के इर्द-गिर्द सिमट गई है।
    पिछले दस साल में घोटाले दर घोटाले औऱ बढ़ती महंगाई के कारण लोगो की नजर दूसरे बड़े दल पर पड़नी ही थी। बीजेपी ने इस मौके को दोनो हाथों से लपक लिया औऱ मोदी को आगे कर दिया। बीजेपी के आक्रामक प्रचार और कांग्रेस की हालत ने मोदी की सख्त शासक की छवि को सुपरमैन सरीखी छवि बना दी है। उनके बरक्श राहूल गांधी कि छवि 2009 की तुलना में कमजोर हुई है। 
      वैसे प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद से अबतक मोदी ने राष्ट्रीय नेता की तरह बर्ताव किया है। भले ही उनके आसपास के नेताओं की जुबान फिसल जाती हो, मगर मोदी हर बयान सतर्क और सधे तरीके से दे रहे हैं। ऐसे में देश के लोकतंत्र पर विश्वास करते हुए एकबार मोदी को मौका देना तो बनता है।
    इस बीच कांग्रेस अभी से चुनाव के बाद संगठन में बदलाव को लेकर काम शुरु कर चुकी है। तो क्या दीवार पर लिखी इबारत सच होने जा रही है...क्या अब कांग्रेस के दिन बदलने वाले हैं? क्या कांग्रेस फिर से कमरकस कर नए अवतार में सामने आएगी? खैर इन सभी सवालों का जवाब  चुनाव के बाद ही मिलेगा। फिलहाल तो बीजेपी सत्ता की दौड़ में आगे चल रही है। मोदी गेम चेंजर नजर आ रहे हैं।
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