बुधवार, 23 जुलाई 2014

To LoVe 2015: जस्टिस काटजू...बांध ही दी घंटी

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्केंडेय काटजू ने बर्रे के छत्ते को पकड़कर झकझोर दिया है। जो बात सालों से दबी छुपी औऱ निजी बातचीत में कही जाती थी उसपर काटजू की दमदार मुहर लग गई है।(काटजू को केंद्र ) न्यायाधीश काटजू की बात के बाद बवाल तो खड़ा होना ही था, सो हुआ। न्यायापालिका में भ्रष्टाचार पर खुलकर बोलना आसान नहीं है। दरअसल ये दूधारी तलवार है....ऐसी दुधारी तलवार जिसका शिकार सिर्फ लोकतंत्र या फिर औऱ लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले होते हैं। मानहानी के मुकदमे का डर कई लोगो को चुप रहने पर मजबूर कर देता है। इसके ठीक उलट मुसीबत ये है कि अगर अदालत की तौहिन पर सजा का प्रावधान न हो तो अनर्गल आरोप लगाने वालों की बाढ़ आ जाती है। जिससे केवल ईमानदार न्यायाधीशों पर दवाब बनता है।((Justice Katju Blog)
निचली अदालतों में न्याय को खरीदे जाने के आरोप खुलेआम वहां काम करने वाले लगाते हैं। उच्च अदालतों से होते हुए अब उच्चतम न्यायालय तक की प्रतिष्ठा पर सवाल उठने लगे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश का मामला पूराना नहीं पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के कुछ रिटायर न्यायाधीशों पर छेड़छाड़ के आरोप लगने लगे हैं। अब देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश लाहोटिया काटजू के सवाल के घेरे में आ गए हैं।(काटजू के सवाल) (2..जस्टिस काटजू)
मगर यहां उल्टा होता है। लोग पूछ रहे हैं जस्टिस काटजू ने इस बात को बताने में दस साल क्यों लगा दिए। हद है, आखिर किसी ने तो खुलेआम बिल्ली के गले में घंटी बांधी है। दस साल बाद ही सही, कोई तो आगे आया है। हो सकता है कि इस आरोप को लगाने की ये टाइमिंग सोची समझी हो, मगर न्यापालिका में होने वाले सुधारों को लागू करना चाहिए। इस समय आम लोग के लिए न्यायापालिका ही आशा का आखिरी केंद्र है।
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